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लोनी में राम वनवास प्रसंग पर छलके आंसू, श्रीरामकथा के सातवें दिन भक्ति और बिछोह का अद्भुत संगम
रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता जन वाणी
लोनी, 21 अप्रैल 2026।
लोनी स्थित सिद्ध बाबा रामपार्क में आयोजित भव्य श्रीरामकथा के सातवें दिन ऐसा भावनात्मक दृश्य देखने को मिला, जिसने श्रद्धालुओं के हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। भगवान श्रीराम के वनवास प्रसंग के मार्मिक वर्णन ने पूरे पंडाल को भक्ति, करुणा और बिछोह के भावों से सराबोर कर दिया। हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु न केवल कथा सुन रहे थे, बल्कि मानो उस युग को स्वयं जी रहे थे—जहां एक पुत्र अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन त्याग देता है।
कथा व्यास परम पूज्य श्री अतुल कृष्ण भारद्वाज जी महाराज ने जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के वनगमन का प्रसंग सुनाया, तो वातावरण पूरी तरह भावुक हो उठा। उनके शब्दों में ऐसी संवेदना थी कि पंडाल में बैठे बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग सभी की आंखें नम हो गईं। अयोध्यावासियों का अपने आराध्य के पीछे-पीछे चल पड़ना, माता कौशल्या का करुण विलाप और लक्ष्मण का अटूट समर्पण—इन प्रसंगों ने हर श्रोता के मन में गहरा असर छोड़ा।
विशेष रूप से बच्चों पर इस प्रसंग का गहरा भावनात्मक प्रभाव देखने को मिला। कई बच्चे अपने परिजनों से प्रश्न करते नजर आए कि “क्या सच में भगवान राम को इतना कष्ट सहना पड़ा था?” यह दृश्य दर्शाता है कि कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कारों और आदर्शों से जोड़ने का माध्यम भी बन रही है।
इस दौरान स्वयं विधायक नंदकिशोर गुर्जर भी भाव-विभोर हो उठे। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े, जो इस बात का प्रतीक थे कि श्रीराम का त्याग और मर्यादा आज भी लोगों के हृदय को उतनी ही गहराई से स्पर्श करता है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि “भगवान श्रीराम का जीवन त्याग, मर्यादा और कर्तव्य की सर्वोच्च मिसाल है। हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना चाहिए, तभी समाज और राष्ट्र सशक्त बन सकता है।”
कथा में दिल्ली विधानसभा के डिप्टी स्पीकर मोहन सिंह बिष्ट सहित अनेक संत-महात्माओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया। सभी ने व्यासपीठ से आशीर्वाद लेकर समाज में धर्म और संस्कारों के प्रसार का संकल्प दोहराया।
व्यास जी ने राजा दशरथ के प्रसंग के माध्यम से यह भी संदेश दिया कि जीवन में जिम्मेदारियों को समय रहते निभाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज के समाज में पारिवारिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, जिसे श्रीराम के आदर्शों से ही पुनर्जीवित किया जा सकता है। माता सीता के त्याग, लक्ष्मण की सेवा और भरत की निष्ठा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यही आदर्श एक मजबूत और संस्कारित समाज की नींव हैं।
कार्यक्रम स्थल पर “जय श्रीराम” के गगनभेदी जयघोष लगातार गूंजते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यह स्पष्ट संकेत दे रही थी कि सनातन संस्कृति के प्रति आस्था न केवल जीवित है, बल्कि और अधिक सशक्त हो रही है।
लोनी की यह श्रीरामकथा अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक जागरण, पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और भावनात्मक एकता का सशक्त मंच बनती जा रही है—जहां हर दिन श्रद्धा, भक्ति और जीवन के गहरे सत्य एक नई अनुभूति के साथ सामने आ रहे हैं।
