गाजियाबाद में ‘फर्जी पत्रकारिता’ का फैलता नेटवर्क: अवैध वसूली, ठगी और ब्लैकमेलिंग से बदनाम हो रहा पेशा

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जन वाणी न्यूज़

गाजियाबाद में ‘फर्जी पत्रकारिता’ का फैलता नेटवर्क: अवैध वसूली, ठगी और ब्लैकमेलिंग से बदनाम हो रहा पेशा

लगातार दर्ज हो रहे मुकदमे, बिना मान्यता सक्रिय सैकड़ों तथाकथित पत्रकार; असली पत्रकारों की साख पर संकट, सत्यापन और कड़ी कार्रवाई की जरूरत

रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक /जन वाणी न्यूज़

गाजियाबाद (लोनी )। क्षेत्रमें पत्रकारिता के नाम पर बढ़ रही अवैध वसूली, ठगी और ब्लैकमेलिंग की घटनाओं ने एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के दिनों में अंकुर विहार थाने में दर्ज हुए मामलों ने इस समस्या को उजागर कर दिया है। पहले एक कथित पत्रकार पर अवैध वसूली का मुकदमा दर्ज हुआ और अब ठगी का एक और मामला सामने आया है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि यह कोई एक-दो घटनाएं नहीं बल्कि एक संगठित प्रवृत्ति का रूप ले चुकी है।

स्थानीय लोगों, व्यापारियों और जिम्मेदार नागरिकों के बीच यह चर्चा आम है कि कुछ असामाजिक तत्व पत्रकारिता की आड़ लेकर इसे कमाई का आसान जरिया बना चुके हैं। बिना किसी प्रशिक्षण, डिग्री या मान्यता के लोग केवल माइक, आईडी कार्ड और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सहारे खुद को ‘पत्रकार’ घोषित कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस तरह की पहचान बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है, जिससे इस क्षेत्र में अनियंत्रित भीड़ बढ़ती जा रही है।

जांच में सामने आया है कि कई तथाकथित पत्रकार न तो किसी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान से जुड़े हैं और न ही पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों या भाषा की समझ रखते हैं। इसके बावजूद वे व्हाट्सएप ग्रुप, पीडीएफ अखबार और सोशल मीडिया चैनलों के जरिए खुद को ‘संपादक’ और ‘संवाददाता’ बताकर सक्रिय हैं। कई मामलों में ये लोग छोटी-छोटी कमियों या विवादों को आधार बनाकर लोगों को डराते हैं और फिर समझौते के नाम पर अवैध धन उगाही करते हैं।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सीधा आघात भी है। जहां एक ओर सच्चे और जिम्मेदार पत्रकार समाज की समस्याओं को उजागर कर व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का कार्य करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे फर्जी तत्व पूरे पेशे को बदनाम कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आम जनता के बीच मीडिया के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो पुलिस और संबंधित विभागों को इन गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई व्यापक और प्रभावी सत्यापन अभियान नहीं चलाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।

सामाजिक स्तर पर भी यह जरूरी हो गया है कि जागरूक नागरिक ऐसे फर्जी पत्रकारों से सतर्क रहें और किसी भी प्रकार की अवैध मांग या दबाव की स्थिति में तुरंत पुलिस को सूचना दें। साथ ही, मीडिया संगठनों और वरिष्ठ पत्रकारों को भी आगे आकर इस प्रवृत्ति के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए।

समाधान के रूप में विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से सुझाव देते हैं कि—
पत्रकारों का अनिवार्य सत्यापन हो,
मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची सार्वजनिक की जाए,
फर्जी आईडी और माइक के दुरुपयोग पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो,
और मीडिया आचार संहिता का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

लोनी में पत्रकारिता की गिरती साख को बचाने के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन, समाज और जिम्मेदार पत्रकार मिलकर इस चुनौती का सामना करें। अन्यथा, ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कहे जाने वाला यह पेशा कुछ स्वार्थी तत्वों के कारण अपनी विश्वसनीयता खोता चला जाएगा।

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