मेरठ में औषधीय पौधों के संरक्षण पर मंथन, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी—“अंधाधुंध दोहन से संकट गहराया”

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मेरठ में औषधीय पौधों के संरक्षण पर मंथन, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी—“अंधाधुंध दोहन से संकट गहराया”

रघुनाथ गर्ल्स पीजी कॉलेज में अतिथि व्याख्यान, वैज्ञानिक संरक्षण और जनभागीदारी पर जोर

नरेन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता / जन वाणी

मेरठ, 18 मार्च।
औषधीय पौधों के बढ़ते व्यावसायिक दोहन और घटती जैव विविधता को लेकर गंभीर चिंता के बीच मेरठ के रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में एक महत्वपूर्ण अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने साफ कहा कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कई बहुमूल्य औषधीय प्रजातियां हमेशा के लिए समाप्त हो सकती हैं।

औषधीय धरोहर पर मंडराता खतरा
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए प्राचार्या प्रोफेसर निवेदिता मलिक ने कहा कि औषधीय पौधे भारतीय संस्कृति और पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि फार्मास्यूटिकल कंपनियों द्वारा बढ़ते व्यावसायिक उपयोग के कारण इन पौधों का तेजी से क्षरण हो रहा है, जिससे कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं।

सतत उपयोग ही भविष्य की कुंजी”
मुख्य वक्ता डॉ. पंजाब सिंह मलिक, एसोसिएट प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग, मेरठ कॉलेज ने अपने व्याख्यान में कहा कि औषधीय पौधों का संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा का भी प्रश्न है।
उन्होंने बताया कि—

प्राकृतिक आवासों और वनस्पति उद्यानों में संरक्षण

वैज्ञानिक खेती और ऊतक संवर्धन तकनीक

स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी

जैसे उपायों से ही इन संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को रोका जा सकता है।

जैव विविधता और स्वास्थ्य सुरक्षा का संबंध
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि औषधीय पौधों की विविधता सीधे तौर पर स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी है। इनका संरक्षण न केवल वर्तमान बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।

सम्मान और सहभागिता
कार्यक्रम के अंत में प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी की ओर से मुख्य वक्ता को औषधीय पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. गरिमा मलिक एवं आयोजिका डॉ. अनुपमा सिंह रहीं, जबकि संयोगिता, डॉ. गीता सिंह और डॉ. मधु मलिक ने आयोजन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

निष्कर्ष: चेतावनी भी, समाधान भी
यह आयोजन केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक चेतावनी और समाधान का मंच बनकर उभरा, जहां विशेषज्ञों ने स्पष्ट संदेश दिया—
“अगर औषधीय पौधों का संरक्षण नहीं हुआ, तो मानवता अपनी ही प्राकृतिक औषधि संपदा से वंचित हो जाएगी।”

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