

जन वाणी न्यूज़
वाराणसी से लखनऊ तक “धर्मयुद्ध” का शंखनाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा से गरमाई सियासत
रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता
वाराणसी/लखनऊ।
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की वाराणसी से लखनऊ तक प्रस्तावित “गो प्रतिष्ठार्थ धर्मयुद्ध शंखनाद यात्रा” ने उत्तर प्रदेश की राजनीति और संत समाज दोनों में हलचल पैदा कर दी है। शनिवार को वाराणसी में गंगा पूजन और मंदिर दर्शन के बाद उन्होंने लखनऊ के लिए प्रस्थान किया।
यह यात्रा केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि सरकार की नीतियों को चुनौती देने वाले एक बड़े आंदोलन के रूप में देखी जा रही है, जिसके केंद्र में गौ संरक्षण, सरकार से टकराव और उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का विवाद भी शामिल है।
गंगा पूजन से यात्रा की शुरुआत
वाराणसी में गंगा घाट पर पूजा-अर्चना और संतों के आशीर्वाद के बाद शंकराचार्य ने यात्रा का औपचारिक शंखनाद किया। उनके साथ बड़ी संख्या में शिष्य और समर्थक मौजूद रहे।
बताया गया है कि यह यात्रा वाराणसी से निकलकर जौनपुर, सुल्तानपुर और रायबरेली होते हुए 11 मार्च को लखनऊ पहुंचेगी, जहां एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है।
“गाय को राज्य माता” बनाने की मांग
शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि गाय को “राज्य माता” का दर्जा दिया जाए और देश से बीफ निर्यात पर रोक लगाई जाए। उन्होंने इन मांगों को लेकर सरकार को 40 दिन का अल्टीमेटम दिया था।
उनका कहना है कि यदि सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
सरकार से टकराव और राजनीतिक बयानबाज़ी
यात्रा के ऐलान के बाद से सरकार और संत के बीच बयानबाज़ी भी तेज हो गई है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में विवाद के संदर्भ में कहा था कि “कोई भी स्वयं को शंकराचार्य नहीं कह सकता”, जिससे बहस और तेज हो गई।
वहीं उपमुख्यमंत्री ने भी गौ हत्या के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य में कठोर कानूनों के कारण ऐसी घटनाओं पर सख्त नियंत्रण है।
विपक्ष का समर्थन
इस आंदोलन को विपक्षी दलों से भी समर्थन मिलने लगा है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने वाराणसी में शंकराचार्य से मुलाकात कर उनके आंदोलन के समर्थन का ऐलान किया और कहा कि संत समाज के सम्मान के लिए कांग्रेस उनके साथ खड़ी रहेगी।
कानूनी विवाद भी बने चर्चा का कारण
इधर शंकराचार्य के खिलाफ हाल ही में प्रयागराज की एक विशेष अदालत के आदेश पर नाबालिगों के यौन शोषण के आरोपों से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज किए जाने का विवाद भी चर्चा में है।
इन आरोपों को शंकराचार्य ने पूरी तरह से निराधार बताते हुए कहा है कि यह उन्हें बदनाम करने की साजिश है और सच्चाई न्यायालय में सामने आएगी।
पहले भी पुलिस से टकराव
यह पहला मौका नहीं है जब शंकराचार्य की गतिविधियों को लेकर प्रशासन के साथ तनाव की स्थिति बनी हो।
माघ मेले के दौरान प्रयागराज में संगम स्नान को लेकर उनकी शोभा यात्रा को पुलिस ने रोक दिया था, जिसके बाद उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया था।
आगे क्या होगा?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वाराणसी से शुरू हुई यह यात्रा लखनऊ पहुंचने तक किस रूप में विकसित होती है।
संत समाज का एक वर्ग इसे धार्मिक आंदोलन बता रहा है, जबकि राजनीतिक दल इसे सरकार और संतों के बीच बढ़ते टकराव के रूप में देख रहे हैं।
यदि लखनऊ में प्रस्तावित कार्यक्रम बड़े प्रदर्शन में बदलता है तो आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और अधिक गर्मा सकता है।
