लोनी के शहीद गुमनामी में क्यों? 1857 से 1942 तक बलिदान, आज तक नहीं कोई शहीद स्मारक

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

लोनी के शहीद गुमनामी में क्यों?
1857 से 1942 तक बलिदान, आज तक नहीं कोई शहीद स्मारक

गाजियाबाद/लोनी।
देश आज गणतंत्र दिवस मना रहा है, लेकिन गाजियाबाद जनपद का लोनी क्षेत्र अपने उन शहीदों और क्रांतिकारियों के लिए आज भी पहचान का इंतजार कर रहा है, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। 1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक लोनी अंचल के गांव-गांव से निकले देशभक्तों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुला प्रतिरोध किया, लेकिन आज तक उनकी स्मृति में कोई स्थायी शहीद स्मारक नहीं बन सका।

मीरपुर हिन्दू, बंथला, पावी, खजूरी, टीला मोड़ सहित अनेक गांवों ने आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। कहीं अंग्रेजी चौकियों पर हमले हुए, कहीं लगान वसूली का विरोध किया गया, तो कहीं क्रांतिकारियों को शरण और रसद उपलब्ध कराई गई। इन आंदोलनों में कई युवकों को फांसी दी गई, कई गोली का शिकार हुए और अनेक ने जेलों में अमानवीय यातनाएँ सहते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि लोनी केवल औद्योगिक या सीमावर्ती क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम की एक मजबूत कड़ी था। इसके बावजूद यहां के शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम न तो किसी स्मारक पर अंकित हैं और न ही नई पीढ़ी तक उनकी कहानियां पहुंच पा रही हैं।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और युवाओं ने एक स्वर में मांग उठाई है कि लोनी में एक केंद्रीय शहीद स्मारक का निर्माण किया जाए, जिसमें गांव-वार शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दर्ज हों। लोगों का कहना है कि यह केवल स्मारक निर्माण का सवाल नहीं, बल्कि इतिहास और सम्मान का विषय है।

युवाओं का स्पष्ट कहना है कि यदि अपने गांवों के शहीदों को ही भुला दिया गया, तो आज़ादी और गणतंत्र का अर्थ अधूरा रह जाएगा। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अपील की है कि शहीद स्मारक निर्माण की मांग को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि लोनी के गुमनाम बलिदानों को वह सम्मान मिल सके, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

 

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