जन वाणी न्यूज़
जब सत्ता खुद अपने रास्ते में खड़ी हो जाए
महोबा की घटना, टूटी सड़कें और टूटता शासन-भरोसा
रविन्द्र बंसल
महोबा । जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का काफिला रोके जाने की घटना केवल एक दिन की राजनीतिक हलचल नहीं है, बल्कि यह उस शासनात्मक विफलता का सार्वजनिक प्रदर्शन है, जो लंबे समय से गांवों की सड़कों और नलों में छिपी हुई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार विरोध सड़क से निकलकर सीधे सत्ता के सामने आ खड़ा हुआ।
यह विरोध नहीं, सिस्टम के खिलाफ अभियोग है
यहां विरोध किसी विपक्षी दल ने नहीं किया। यह किसी चुनावी रैली का शोर भी नहीं था। यह सत्तारूढ़ दल के विधायक और 100 से अधिक ग्राम प्रधानों द्वारा किया गया खुला प्रतिरोध था। यही तथ्य इस घटना को असाधारण और चिंताजनक बनाता है।
जब सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि खुद सड़क पर उतरकर मंत्री का रास्ता रोकें, तो यह माना जाना चाहिए कि समस्या भाषणों की नहीं, जमीन की है।
सड़कें टूटीं, भरोसा भी टूटा
जल जीवन मिशन के तहत गांव-गांव खुदाई हुई, पाइप डाली गईं, योजनाओं की फाइलें पूरी हुईं। लेकिन ज़मीन पर सच्चाई यह है कि सड़कें बदहाल हैं और नलों में पानी नहीं। गांवों में आज भी लोग टैंकर, हैंडपंप और वैकल्पिक साधनों पर निर्भर हैं।
यह सवाल अब केवल सड़क मरम्मत का नहीं रह गया, यह शासन की विश्वसनीयता का सवाल बन चुका है।
अखिलेश यादव का बयान: राजनीति या आईना?
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस घटना को भाजपा सरकार के भीतर टकराव बताते हुए तीखा राजनीतिक बयान दिया। इसे विपक्षी हमला कहा जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि यह आईना सत्ता ने खुद अपने सामने रखा है।
जब एक ही दल का विधायक, अपनी ही सरकार के मंत्री को सार्वजनिक रूप से रोकता है, तो विपक्ष को बोलने का मौका नहीं—तर्क मिलता है।
‘बंधक’ शब्द से आगे की सच्चाई
राजनीतिक बयान में प्रयुक्त शब्दों पर बहस हो सकती है, लेकिन तथ्य यह है कि मंत्री का काफिला रुका, मार्ग अवरुद्ध हुआ, प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा और हालात नियंत्रण में लाने पड़े। यही घटना की गंभीरता है।
यह दृश्य दिखाता है कि सत्ता और जनता के बीच संवाद टूट चुका है।
डबल इंजन नहीं, ढीला पहिया
सरकार की योजनाएं कागज़ पर तेज़ रफ्तार से चलती दिख सकती हैं, लेकिन महोबा का दृश्य बताता है कि नीचे का पहिया फिसल चुका है। जब गांवों में पानी नहीं और रास्ते टूटे हों, तो किसी भी इंजन की गति अर्थहीन हो जाती है।
यह चेतावनी है, घटना नहीं
महोबा की घटना को यदि सिर्फ एक राजनीतिक विवाद मानकर टाल दिया गया, तो यह भूल होगी। यह एक संकेत है कि यदि बुनियादी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो ऐसे दृश्य बार-बार सामने आएंगे—चाहे सत्ता किसी की भी हो।
निष्कर्ष
महोबा में मंत्री का रास्ता रोका जाना सत्ता के भीतर उठी वह आवाज़ है, जिसे अब अनसुना नहीं किया जा सकता। यह विपक्ष की साजिश नहीं, बल्कि प्रशासनिक शिथिलता का परिणाम है।
जब अपने ही विधायक सड़क पर खड़े होकर सवाल पूछने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि संकट बाहर नहीं—अंदर है। और अंदर के संकट का समाधान केवल बयान से नहीं, काम से होगा।
