रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
आस्था, सत्ता और राजनीति के चौराहे पर उत्तर प्रदेश

शंकराचार्य प्रसंग और इसके पीछे उभरता बहुस्तरीय राजनीतिक परिदृश्य
उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता और विपक्ष के पारंपरिक संघर्ष तक सीमित नहीं है। प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र से शुरू हुआ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच का विवाद अब धार्मिक परंपरा, संत समाज की स्वायत्तता, सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक संतुलन जैसे गहरे प्रश्नों को जन्म दे चुका है।
केशव प्रसाद मौर्य का बयान: सियासी संकेत या संतुलन का प्रयास
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य द्वारा शंकराचार्य से “प्रार्थना” करने और विवाद को बढ़ने से रोकने की अपील को अलग-अलग कोणों से देखा जा रहा है। एक दृष्टि से यह बयान सरकार की ओर से टकराव टालने और संत समाज को सम्मान देने का प्रयास माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, राजनीतिक हलकों में इसे यह संकेत भी माना गया कि सरकार इस पूरे विवाद की गंभीरता और उसके संभावित राजनीतिक असर को लेकर सतर्क है।
कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि डिप्टी सीएम का यह रुख सरकार के भीतर शक्ति संतुलन और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है, खासकर तब जब ब्राह्मण समाज की उपेक्षा के आरोप और विधायकों की बैठकें सुर्खियों में हों।
‘योगी को किनारे लगाने’ की थ्योरी
इस विवाद के साथ-साथ एक और चर्चा ने जोर पकड़ा है—क्या यह सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक रूप से कमजोर करने या अलग-थलग करने की कोशिश है?
कुछ वर्गों का कहना है कि शंकराचार्य प्रसंग को जानबूझकर राजनीतिक रंग दिया जा रहा है ताकि सरकार और संत समाज के बीच दूरी बढ़े। हालांकि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आए हैं, लेकिन यह धारणा इसलिए मजबूत होती दिख रही है क्योंकि विवाद का स्वर लगातार प्रशासनिक मुद्दे से आगे बढ़कर वैचारिक टकराव की ओर जा रहा है।
सनातन विभाजन की आशंका
कुछ संतों, सामाजिक चिंतकों और आम नागरिकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सनातन समाज को भीतर से विभाजित करने की कोशिश भी हो सकती है—जहां एक ओर परंपरा, दूसरी ओर सत्ता खड़ी दिखाई दे। यह दृष्टिकोण मानता है कि शंकराचार्य जैसे पदों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करना केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी धार्मिक व्यवस्था को अस्थिर करने का प्रयास हो सकता है।
हालांकि यह भी सच है कि ऐसे आरोपों को बिना ठोस प्रमाण के स्वीकार करना स्वयं विवाद को और गहरा कर सकता है।
विपक्षी दलों की भूमिका
समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को सरकार की कार्यशैली और संवेदनशीलता से जोड़कर उठाया। अखिलेश यादव द्वारा शंकराचार्य से टेलीफोन पर संवाद को कुछ लोग संवेदना और संवाद के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक अवसरवाद मान रहे हैं। विपक्ष का प्रयास स्पष्ट दिखता है—सरकार के पारंपरिक समर्थक वर्गों में असंतोष को स्वर देना।
शारदा पीठ के शंकराचार्य का बयान और उसका समय
द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती द्वारा यह स्पष्ट किया जाना कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानने को लेकर शेष तीनों शंकराचार्यों का समर्थन है, स्वयं में कोई विवादास्पद वक्तव्य नहीं है। लेकिन बयान का समय इसे साधारण नहीं रहने देता।
यह वक्तव्य न तो सरकार के खिलाफ है और न ही किसी आंदोलन का आह्वान, लेकिन यह यह रेखा खींच देता है कि धार्मिक मान्यता का निर्धारण सत्ता नहीं, परंपरा करती है। मौजूदा हालात में इसे संत समाज की सामूहिक चेतना के रूप में देखा जा रहा है।
प्रशासन, संत और समाज—तीनों के बीच संवाद की कमी
बरेली में पीसीएस अधिकारी द्वारा कथित अभद्र व्यवहार और उसके विरोध में दिया गया त्यागपत्र इस बात का संकेत है कि विवाद केवल शीर्ष स्तर तक सीमित नहीं रहा। नीचे तक असंतोष की लहर महसूस की जा रही है, जो यदि संवाद से नहीं संभाली गई तो सामाजिक तनाव का रूप ले सकती है।
संभावित राजनीतिक और सामाजिक परिणाम
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है:
सरकार को अपने सामाजिक संतुलन पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है
विपक्ष को नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिलेगा
संत समाज और प्रशासन के बीच विश्वास का संकट गहरा सकता है
वहीं यदि संवाद स्थापित होता है, तो यह संकट सरकार के लिए एक संयम और परिपक्वता का अवसर भी बन सकता है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां आस्था, परंपरा और सत्ता—तीनों को संतुलन साधना होगा। शंकराचार्य प्रसंग को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उतना ही खतरनाक है, जितना इसे पूरी तरह राजनीतिक साजिश मान लेना।
सवाल यह नहीं कि कौन सही है या कौन गलत, सवाल यह है कि क्या संवाद की जगह टकराव लेगा या विवेक?
यही उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगा।
