जन वाणी न्यूज़
सत्ता की सुई पर टिका सच: पत्रकारों का उत्पीड़न और अडिग कलम की लड़ाई
झूठे मुकदमे, धमकियां और मानसिक दबाव के बीच सच की मशाल
रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता
गाजियाबाद । लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार आज कई स्तरों पर उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। जब-जब किसी खबर से सत्ता, तंत्र या प्रभावशाली वर्ग असहज होता है, तब-तब पत्रकारों पर तरह-तरह के दबाव बनाए जाते हैं। उनके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं, नोटिसों की बौछार की जाती है, विज्ञापन बंद करने की धमकी दी जाती है और सामाजिक बदनामी का जाल बुना जाता है।
मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना: कलम को डराने की कोशिश
सिर्फ कानूनी शिकंजा ही नहीं, बल्कि कई मामलों में पत्रकारों को मानसिक और शारीरिक रूप से भी प्रताड़ित किया जाता है। धमकी भरे फोन, पीछा किया जाना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और यहां तक कि मारपीट की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। परिवार तक को दबाव में लेने की कोशिश की जाती है ताकि पत्रकार सच की राह छोड़ दे।
लोकतंत्र पर हमला या असहमति का दमन?
जब किसी पत्रकार पर झूठा मुकदमा दर्ज होता है या उसे चुप कराने की कोशिश होती है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार होता है। सवाल उठता है—क्या असहमति को दबाने का यह नया तरीका बनता जा रहा है? क्या सवाल पूछना अब अपराध की श्रेणी में रखा जा रहा है?
सिस्टम का पक्ष: जांच, जिम्मेदारी और मर्यादा की दलील
दूसरी ओर प्रशासन और संबंधित पक्ष यह तर्क देते हैं कि यदि किसी पत्रकार द्वारा तथ्यात्मक त्रुटि, भ्रामक खबर या कानून का उल्लंघन किया जाता है, तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि पत्रकारिता की आड़ में गलत सूचना फैलाना भी उतना ही घातक है। ऐसे में निष्पक्ष जांच और संतुलित कार्रवाई आवश्यक है।
यही वह बिंदु है जहां निष्पक्षता और दमन के बीच की रेखा बेहद पतली हो जाती है।
विषम परिस्थितियों में भी अडिग पत्रकार
इतिहास गवाह है कि सच्चा पत्रकार वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी सच के साथ खड़ा रहता है। आर्थिक दबाव, सामाजिक बहिष्कार और कानूनी चुनौतियों के बावजूद जो कलम नहीं रुकती, वही पत्रकारिता की असली पहचान है।
सही मायने में पत्रकार वही है जो व्यक्तिगत हानि की परवाह किए बिना जनहित को प्राथमिकता देता है, तथ्यों की जांच करता है और सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखता है।
जरूरत: सुरक्षा, जवाबदेही और पत्रकार एकता
आज आवश्यकता है कि पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, झूठे मुकदमों की निष्पक्ष जांच हो और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ठोस तंत्र विकसित किया जाए। साथ ही पत्रकारिता के मानकों और आचार संहिता का पालन भी उतना ही अनिवार्य है ताकि विश्वसनीयता बनी रहे।
पत्रकारों का उत्पीड़न किसी एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा है। कलम पर दबाव जितना बढ़ेगा, सच की जरूरत उतनी ही तीव्र होगी।
क्योंकि अंततः—डर के साए में नहीं, साहस की रोशनी में ही पत्रकारिता जीवित रहती है।
