जन वाणी न्यूज़
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
नियमों के दुरुपयोग की आशंका, केंद्र सरकार को नोटिस; 19 मार्च को अगली सुनवाई
रविन्द्र बंसल
नई दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए नए समानता संबंधी नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान स्वरूप में ये नियम दुरुपयोग का माध्यम बन सकते हैं और इससे संवैधानिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका है। न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जवाब तलब करते हुए नोटिस जारी किया है, जबकि अगली सुनवाई 19 मार्च को निर्धारित की गई है।
क्या है मामला: नए नियमों पर क्यों उठा विवाद
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता सुनिश्चित करने और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम लागू किए थे। इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में समानता समिति के गठन तथा भेदभाव संबंधी शिकायतों के निस्तारण के लिए एक विशेष व्यवस्था की गई थी।
हालांकि, इन नियमों को लेकर न्यायालय में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा सीमित और अस्पष्ट रखी गई है, जिसके कारण सामान्य वर्ग के छात्र और कर्मचारी इस संरक्षण व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। इसी आधार पर इन नियमों को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के विपरीत बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों की भाषा ऐसी है, जिससे मनमानी शिकायतों और प्रशासनिक उत्पीड़न का रास्ता खुल सकता है। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा—
“हम ऐसे ढांचे की ओर नहीं बढ़ सकते, जहां नियम अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएं और उनका उपयोग दबाव या प्रतिशोध के साधन के रूप में होने लगे।”
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि नियमों में स्पष्टता और संतुलन नहीं लाया गया, तो इससे उच्च शिक्षण संस्थानों में अस्थिरता और टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं के तर्क: समानता के नाम पर असमानता?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि—
नियमों में केवल कुछ वर्गों को संरक्षण दिया गया है, जबकि समान परिस्थितियों में अन्य वर्गों को इससे बाहर रखा गया है।
यह व्यवस्था समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।
शिकायत निस्तारण की प्रक्रिया में दुरुपयोग रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान नहीं किए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि बिना स्पष्ट दिशा-निर्देशों के ये नियम शैक्षणिक वातावरण को भय और दबाव का क्षेत्र बना सकते हैं।
केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का पक्ष
केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से यह दलील दी गई है कि नए नियमों का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को संरक्षण देना और शिक्षण संस्थानों में समान अवसर सुनिश्चित करना है। सरकार का कहना है कि यदि किसी प्रावधान में अस्पष्टता है, तो उसे संशोधन के माध्यम से दूर किया जा सकता है, लेकिन नियमों की मंशा पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
देशभर में प्रतिक्रिया: समर्थन और विरोध दोनों
उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद देशभर के शिक्षण परिसरों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
एक ओर कुछ छात्र संगठन और सामाजिक समूह इन नियमों को सामाजिक न्याय की दिशा में आवश्यक कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में छात्र और शिक्षाविद् इन्हें भेदभावपूर्ण और एकतरफा व्यवस्था करार दे रहे हैं।
आगे की राह: 19 मार्च की सुनवाई अहम
अब निगाहें 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि—
नियमों में समानता का संतुलन कैसे साधा जाएगा,
दुरुपयोग की आशंकाओं को कैसे रोका जाएगा,
और क्या सभी वर्गों के लिए समान संरक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
निष्कर्ष
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नीतिगत मंशा के साथ-साथ संवैधानिक संतुलन भी अनिवार्य है। यह मामला अब केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समानता, अधिकार और न्याय की व्यापक बहस का केंद्र बन चुका है। आने वाला फैसला न केवल इन नियमों की दिशा तय करेगा, बल्कि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की संवैधानिक सीमाओं को भी परिभाषित करेगा।
