“साहब, हमारा घर मत उजाड़िए…” एसडीएम के पैरों में गिरी महिला की सिसकियाँ, आशियाना बचाने की गुहार

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़ 

“साहब, हमारा घर मत उजाड़िए…”

एसडीएम के पैरों में गिरी महिला की सिसकियाँ, आशियाना बचाने की गुहार

बहराइच । प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर जब किसी का आशियाना उजाड़ा जाता है, तो उसके पीछे सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं टूटते, बल्कि एक पूरा जीवन बिखर जाता है। ऐसा ही एक मार्मिक दृश्य उस समय देखने को मिला जब अपने घर को बचाने की आख़िरी उम्मीद लेकर एक महिला उपजिलाधिकारी (एसडीएम) के पैरों में गिर पड़ी। आंखों से बहते आंसू, कांपती आवाज़ और टूटती हुई उम्मीदें—यह दृश्य प्रशासनिक संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

घर नहीं, जीवन उजड़ने का दर्द

तस्वीरों में साफ दिखाई देता है कि किस तरह वर्षों की मेहनत से बने आशियाने को तोड़ने की तैयारी की जा रही है। जिन घरों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब बुलडोज़र की धमक सुनाई दे रही है। पीड़ित महिला का कहना है कि यह घर सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार की पहचान और सुरक्षा का आधार है।

जानवरों के लिए जगह, इंसानों के लिए बेघरपन?”

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन घरों को तोड़ा जा रहा है, वहां भविष्य में जानवरों के रहने का ठिकाना बनाया जाएगा। सवाल यह है कि क्या इंसानों को बेघर कर जानवरों के लिए व्यवस्था करना न्यायसंगत है? क्या प्रशासन ने पुनर्वास, मुआवजा या वैकल्पिक व्यवस्था पर कोई गंभीर विचार किया?

प्रशासनिक कार्रवाई या अमानवीय निर्णय?

पीड़ितों का कहना है कि उन्हें न तो समुचित नोटिस मिला, न ही कोई ठोस पुनर्वास योजना सामने रखी गई। अचानक की गई कार्रवाई ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। यह पूरी कार्रवाई प्रशासनिक नियमों की आड़ में की गई एक ऐसी प्रक्रिया प्रतीत होती है, जिसमें मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।

महिला की गुहार: आख़िरी उम्मीद प्रशासन से

एसडीएम के पैरों में गिरकर रोती महिला की तस्वीरें सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन तमाम गरीब और असहाय परिवारों की आवाज़ हैं, जिनका सब कुछ एक फैसले में छिनने जा रहा है। महिला बार-बार यही कहती दिखी—
“साहब, अगर घर चला गया तो हम कहां जाएंगे?”

सवाल जो जवाब मांगते हैं

क्या प्रशासन ने पुनर्वास की कोई ठोस योजना बनाई है?

क्या मानवीय आधार पर कार्रवाई को कुछ समय के लिए रोका जा सकता था?

क्या विकास के नाम पर गरीबों को कुचलना ही एकमात्र विकल्प है?

यह मामला केवल अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन और इंसानी गरिमा का है। यदि समय रहते प्रशासन ने मानवीय दृष्टिकोण नहीं अपनाया, तो यह प्रकरण एक गंभीर सामाजिक अन्याय के रूप में दर्ज होगा।

> सूत्रों के अनुसार वन विभाग ने पौधरोपण के नाम पर कुल 74 हेक्टेयर भूमि की मांग की थी, जिसके बाद राजस्व विभाग ने बिना मौके पर स्पष्ट सीमांकन कराए ही केवल कागजी प्रक्रिया के आधार पर 71 हेक्टेयर जमीन चिन्हित कर वन विभाग को सौंप दी। ग्रामीणों का आरोप है कि यह सीमांकन गूगल मैप के आधार पर किया गया, जबकि वास्तविक जमीनी स्थिति और ग्राम सीमाओं की पुष्टि नहीं की गई। इससे किसानों की कृषि भूमि प्रभावित होने की आशंका है और बड़े पैमाने पर नुकसान का खतरा मंडरा रहा है।

 

ग्रामीण विरोध और प्रशासन पर सवाल:

> 12 जनवरी को ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि सरकारी भूमि की निष्पक्ष जांच कराई जाए और विवादित जमीन पर जबरन जंगल न लगाया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि बिना पारदर्शी सीमांकन के यह कार्रवाई प्रशासनिक मनमानी को दर्शाती है, जिससे क्षेत्र में असंतोष और टकराव की स्थिति बन सकती है।

 

सीमा विवाद और सुरक्षा एंगल:

> ग्राम प्रधान के अनुसार विवादित भूमि बहराइच और लखीमपुर खीरी जिलों की सीमा पर स्थित है, जहां स्पष्ट सीमांकन के अभाव में की गई कार्रवाई न केवल किसानों के हितों पर कुठाराघात है, बल्कि भविष्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगाड़ सकती है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही से जंगली जानवरों का खतरा बढ़ेगा और गांवों की सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।

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