गोली चली, खामोश रही पुलिस—पकड़े गए आरोपी तो हुआ खुलासा

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

गोली चली, खामोश रही पुलिस—पकड़े गए आरोपी तो हुआ खुलासा

ट्रोनिका सिटी में कानून व्यवस्था की सच्चाई उजागर, घटना छुपाने के आरोप

गाजियाबाद के ट्रोनिका सिटी थाना क्षेत्र में हुई दिनदहाड़े गोलीबारी की घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि भूमि विवाद में हुई इस गंभीर वारदात को पुलिस ने जानबूझकर मीडिया और जनता से छुपाए रखा। जब तक आरोपी खुले घूमते रहे, तब तक सिस्टम मौन रहा और जैसे ही अपराधी गिरफ्तार हुए, पुलिस ने घटना का “खुलासा” कर अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी।

तमंचे गरजे, खून बहा—लेकिन रिकॉर्ड में सन्नाटा

16 जनवरी 2026 को तमंचों से लैस बदमाशों ने खुलेआम एक परिवार पर हमला बोला। जान से मारने की नीयत से की गई फायरिंग में एक युवक के पैर में गोली लगी और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। सवाल यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद पुलिस ने न तो तत्काल प्रेस को जानकारी दी और न ही आमजन को आगाह किया। क्या ट्रोनिका सिटी में अब गोलीबारी “रूटीन मैटर” बन चुकी है?

पहले कहानी बदली, फिर धाराएं—सच दबाने की कोशिश?

घटना के बाद पुलिस ने पहले इसे लूट का मामला बताने की कोशिश की, लेकिन बाद में खुद ही अपनी कहानी से पलटना पड़ा। विवेचना में सामने आया कि यह लूट नहीं बल्कि हत्या के प्रयास और बलवे की वारदात थी। बड़ा सवाल यह है कि क्या शुरुआत से ही सच्चाई पता थी, लेकिन जानबूझकर हल्की धाराएं लगाकर मामले को दबाने का प्रयास किया गया?

हत्या के आरोपी सड़कों पर, पुलिस निगरानी कहां?

गिरफ्तार आरोपियों का आपराधिक इतिहास किसी से छुपा नहीं है। एक पर पहले से हत्या और आर्म्स एक्ट के मामले दर्ज हैं, तो दूसरे पर गैंगस्टर एक्ट। इसके बावजूद ये आरोपी क्षेत्र में बेखौफ घूमते रहे और गोलीबारी जैसी वारदात को अंजाम दे डाला। यह स्थिति साफ इशारा करती है कि अपराधियों पर पुलिस का डर खत्म हो चुका है।

अपराध बढ़ते रहे, पुलिस आंकड़े सजाती रही

स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्रोनिका सिटी, लोनी और आसपास के इलाकों में आए दिन फायरिंग, मारपीट और जमीन विवादों में खूनखराबा हो रहा है, लेकिन पुलिस या तो घटनाओं को “आपसी विवाद” बताकर टाल देती है या फिर मीडिया से दूरी बनाए रखती है। नतीजा यह कि अपराधी बेखौफ हैं और आम नागरिक डरे हुए।

गिरफ्तारी के बाद ही क्यों सामने आता है सच?

सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यही है कि क्या पुलिस तब तक किसी घटना को छुपाती रहती है, जब तक आरोपी पकड़ में न आ जाएं? क्या कानून का मकसद सिर्फ गिरफ्तारी दिखाकर वाहवाही लूटना रह गया है, जबकि घटना के समय पीड़ित अपने हाल पर छोड़ दिए जाते हैं?

जनता के भरोसे पर गोली

यह मामला सिर्फ एक गोलीबारी नहीं है, बल्कि पुलिसिया पारदर्शिता पर सीधा हमला है। यदि इसी तरह गंभीर अपराधों को दबाने और देर से उजागर करने की नीति चलती रही, तो आमजन का पुलिस से भरोसा पूरी तरह टूटना तय है।

चेतावनी है यह घटना

ट्रोनिका सिटी की यह गोलीबारी एक चेतावनी है—यदि अपराधियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई और पुलिस की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में हालात और भयावह हो सकते हैं।

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