गाजियाबाद के मीरपुर हिन्दू गांव में राकेश टिकैत की हुंकार: ट्रैक्टर-ट्रालियों से घिरा गांव, कूड़ा प्लांट के खिलाफ निर्णायक बिगुल

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जन वाणी न्यूज़

गाजियाबाद के मीरपुर हिन्दू गांव में राकेश टिकैत की हुंकार: ट्रैक्टर-ट्रालियों से घिरा गांव, कूड़ा प्लांट के खिलाफ निर्णायक बिगुल

ट्रैक्टर चलाकर पहुंचे राकेश टिकैत, दो टूक—“खेती की जमीन पर कूड़ा नहीं, अधिकार की लड़ाई अब आर-पार” | प्रशासन संग वार्ता के बाद जांच तक निर्माण पर पूर्ण विराम

रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता

लोनी। खादर के मीरपुर हिन्दू गांव ने शनिवार को एक ऐसे जनसैलाब का साक्षी बना, जिसने साफ संकेत दे दिया कि यह विरोध अब औपचारिकता नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। कूड़ा निस्तारण प्लांट के विरोध में बुलाई गई महापंचायत में दूर-दराज़ के गांवों से किसान ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर पहुंचे। गांव की गलियां और पंचायत स्थल ट्रैक्टरों की कतारों से पट गए—मानो पूरा इलाका एक स्वर में कह रहा हो, “जमीन बचाओ, भविष्य बचाओ।”

पंचायत को संबोधित करने भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत स्वयं पहुंचे। ग्रामीण सैकड़ों ट्रैक्टरों के साथ मंडोला विहार योजना तक गए और वहां से टिकैत को साथ लेकर आए। टिकैत ने खुद ट्रैक्टर की कमान संभाली और काफिले के साथ पंचायत स्थल तक पहुंचे—यह दृश्य किसानों की एकजुटता और संघर्ष की प्रतीकात्मक तस्वीर बन गया।

“यह कूड़ा प्लांट नहीं, किसानों के भविष्य पर प्रहार है”

अपने धारदार संबोधन में राकेश टिकैत ने कहा कि उपजाऊ कृषि भूमि और आबादी के समीप कूड़ा प्लांट स्थापित करना पर्यावरणीय मानकों और मानवीय संवेदनाओं दोनों के खिलाफ है।

उन्होंने स्पष्ट कहा—

किसानों की सहमति के बिना कोई निर्माण स्वीकार नहीं होगा।

लाठीचार्ज जैसी घटनाएं किसानों को डराने की कोशिश हैं, पर इतिहास गवाह है कि किसान झुकता नहीं।

यह लड़ाई केवल मीरपुर हिन्दू की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की अस्मिता की लड़ाई है।

टिकैत ने चेताया कि यदि किसानों की आवाज को दबाया गया या जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रही, तो आंदोलन को व्यापक और निर्णायक रूप दिया जाएगा।

पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा—तीन बड़े सवाल

महापंचायत में वक्ताओं ने कहा कि प्रस्तावित प्लांट से निकलने वाला कचरा और प्रदूषण भूजल, हवा और खेतों को प्रभावित करेगा। पास ही स्कूल के लिए आरक्षित भूमि का मुद्दा भी उठाया गया। ग्रामीणों ने आशंका जताई कि यदि समय रहते रोक नहीं लगी तो आने वाली पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाएंगी।

किसानों का तर्क है कि पहले से ही क्षेत्र बरसाती नालों में बहकर आने वाले औद्योगिक अपशिष्ट से जूझ रहा है। बागपत और खेकड़ा की फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला पानी नवादा, मीरपुर और ट्रॉनिका सिटी तक असर डाल रहा है, जिसकी निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में नया प्लांट जले पर नमक जैसा होगा।

प्रशासन से आमने-सामने वार्ता, जांच समिति पर मुहर

पंचायत के दौरान उपजिला अधिकारी लोनी, एसीपी लोनी और उपनगरायुक्त मौके पर पहुंचे। लगभग एक घंटे चली तीखी लेकिन संयमित वार्ता के बाद सहमति बनी कि एक संयुक्त जांच समिति गठित की जाएगी।

समिति में प्रदूषण, पर्यावरण, जल संरक्षण, जल शक्ति और शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। साथ ही ग्रामीणों की भी एक कमेटी बनेगी, जिसमें भारतीय किसान यूनियन का प्रतिनिधि शामिल रहेगा।

सबसे अहम फैसला—जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आती और ग्रामीण कमेटी के साथ वार्ता में ठोस समाधान नहीं निकलता, तब तक प्लांट में किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं कराया जाएगा। इसी सहमति के बाद पंचायत का समापन हुआ।

पुराने घाव भी हुए ताज़ा

महापंचायत में मंडोला विहार योजना से वर्षों से प्रभावित किसानों की लंबित मांगों का मुद्दा भी जोरदार ढंग से उठा। किसानों ने कहा कि मुआवजा, पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं आज तक अधूरी हैं।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध समाधान की कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए।

टकराव टला या चेतावनी स्थगित?

मीरपुर हिन्दू की यह महापंचायत फिलहाल टकराव को टालने में सफल रही है, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि संघर्ष समाप्त नहीं हुआ—सिर्फ अगली रिपोर्ट तक स्थगित हुआ है।

ट्रैक्टर-ट्रालियों से उमड़ी भीड़ और मंच से उठी आवाजों ने यह संदेश दे दिया है कि किसान अब अपनी जमीन, पानी और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को लेकर किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं।

अब निगाहें जांच समिति की निष्पक्षता और प्रशासन की नीयत पर टिकी हैं—क्या यह संवाद समाधान का रास्ता खोलेगा या मीरपुर हिन्दू आने वाले दिनों में एक बड़े आंदोलन की भूमि बनेगा?

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