माघ मेला विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान से वंचित, प्रशासन और आस्था में टकराव बढ़ा

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जन वाणी न्यूज़

माघ मेला विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान से वंचित, प्रशासन और आस्था में टकराव बढ़ा

 

सुप्रीम कोर्ट में लंबित पदवी का मामला, संत समाज में विभाजन और राजनीति में उठापटक — 11 दिन के धरने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला छोड़ा

 

प्रयागराज से रिपोर्ट
रविन्द्र बंसल
माघ मेला 2026 में प्रयागराज का संगम इस बार केवल आस्था और धर्म का स्थल नहीं रहा, बल्कि प्रशासन, कानून और राजनीतिक शक्ति के बीच संघर्ष का अखाड़ा बन गया। साधु‑संन्यासियों और प्रशासन के बीच उत्पन्न विवाद ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम स्नान के लिए पहुंचे, लेकिन प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़‑प्रबंधन के कारण उन्हें रोक दिया। विवाद का केंद्र बिंदु केवल स्नान नहीं रहा, बल्कि शंकराचार्य पद की वैधता और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला भी सामने आया।

शंकराचार्य पद की परंपरा और मान्यता

शंकराचार्य पद भारत की सनातन परंपरा में एक अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान रखता है। आठवीं सदी में आदि‑शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की और उनके अनुयायियों द्वारा पद की मान्यता स्थापित की गई। यह पद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गुरु‑शिष्य परंपरा और विद्वता का प्रतीक भी है।

हालांकि समय‑समय पर पदवी की वैधता और नियुक्ति को लेकर विवाद होते रहे हैं, परंपरा और समाज की स्वीकार्यता ने इसे वर्षों तक स्थिर रखा।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी पहलू

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पदवी की वैधता को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। प्रशासन ने पदवी के इस्तेमाल पर स्पष्ट प्रमाण मांगा। उनके वकील का कहना है कि अदालत ने किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई। प्रशासन की यह कार्रवाई विवाद को केवल धार्मिक नहीं बल्कि विधिक और प्रशासनिक स्तर तक ले गई।

 

विवाद का तूल

18 जनवरी को नोटिस जारी होने के बाद संत समाज में विभाजन देखा गया। कुछ प्रमुख संतों ने उनका समर्थन किया, जबकि अन्य ने पद पर सवाल उठाए।

राजनीति में भी मामला तूल पकड़ गया। वरिष्ठ नेताओं ने प्रशासन की आलोचना की, विपक्षी दलों ने इसे सरकार की धार्मिक संवेदनाओं पर सवाल उठाने का अवसर माना।

धरना, संघर्ष और प्रस्थान

मौनी अमावस्या के दिन रोक के बाद स्वामी ने धरना और अनशन शुरू किया। उनका मूल उद्देश्य पारंपरिक स्नान था, लेकिन यह सम्मान और पहचान का संघर्ष बन गया। लगभग 11 दिन के विरोध के बाद, 28 जनवरी को उन्होंने माघ मेला छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा, “दिल में दुख हो तो संगम भी शांति नहीं देता।”

 

निष्कर्ष

1. धार्मिक पदवी और परंपरा का सम्मान — परंपरा, गुरु‑शिष्य अनुक्रम और समाज की स्वीकार्यता पदवी की वास्तविक मान्यता है।

2. कानून और प्रथा के बीच संतुलन — प्रशासनिक आदेश पर्याप्त नहीं, संवाद और न्यायिक स्पष्टता जरूरी है।

3. धार्मिक भावनाओं की संवेदनशीलता — आस्था और विश्वास के साथ संतुलन स्थापित करना शासन के लिए चुनौती है।

 

इस विवाद ने स्पष्ट किया कि भारत जैसे बहु‑धर्मी और बहु‑आस्थावाले समाज में धर्म, कानून और प्रशासन का संतुलन न केवल आवश्यक है, बल्कि भविष्य के लिए भी निर्णायक सिद्ध होगा।

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