रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
लोहड़ी और मकर संक्रांति : अग्नि से सूर्य तक, भारतीय संस्कृति की एकात्म यात्रा
ऋतु परिवर्तन, कृषि परंपराएं और सामाजिक सौहार्द को जोड़ने वाले दो पर्व, एक ही सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब
भारत की सांस्कृतिक चेतना में पर्व केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, समाज और जीवन-दर्शन को जोड़ने वाले सेतु होते हैं। लोहड़ी और मकर संक्रांति ऐसे ही दो प्रमुख पर्व हैं, जो अलग-अलग नामों और परंपराओं के बावजूद एक ही सांस्कृतिक धारा से जुड़े हुए हैं। दोनों पर्व ऋतु परिवर्तन, कृषि चक्र और सामाजिक सौहार्द के प्रतीक हैं तथा एक-दूसरे के पूरक के रूप में भारतीय लोकजीवन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऋतु परिवर्तन और सूर्य उपासना से संबंध
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुरुआत का पर्व है। यह दिन प्रकाश, ऊर्जा और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसके ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली लोहड़ी, इसी परिवर्तन की पूर्व संध्या का उत्सव है। इस प्रकार लोहड़ी और मकर संक्रांति कालक्रम से भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। लोहड़ी जहां पुराने मौसम और कठिन परिश्रम को विदाई देने का पर्व है, वहीं मकर संक्रांति नई ऊर्जा, नई फसल और शुभ समय के आगमन का संकेत देती है।
कृषि संस्कृति में दोनों पर्वों का महत्व
दोनों पर्वों की जड़ें कृषि आधारित समाज में हैं। लोहड़ी रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक है, जबकि मकर संक्रांति उस फसल से प्राप्त समृद्धि को समाज के साथ साझा करने का संदेश देती है। लोहड़ी में अग्नि को अर्पण कर प्रकृति और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, वहीं मकर संक्रांति पर स्नान, दान और सत्कर्म के माध्यम से सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किया जाता है। इस प्रकार दोनों पर्व किसान के परिश्रम और प्रकृति के संतुलन को सम्मान देते हैं।
अग्नि और सूर्य : एक ही तत्व के दो स्वरूप
लोहड़ी में प्रज्वलित अग्नि जीवन, ऊर्जा और शुद्धता का प्रतीक है। मकर संक्रांति में सूर्य उपासना इसी ऊर्जा का व्यापक रूप है। अग्नि और सूर्य दोनों ही प्रकाश के स्रोत हैं और भारतीय दर्शन में इन्हें जीवनदायी माना गया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो लोहड़ी और मकर संक्रांति एक ही तत्व—ऊर्जा और प्रकाश—के दो अलग-अलग सांस्कृतिक स्वरूप हैं।
सामाजिक सौहार्द और सामूहिकता का संदेश
लोहड़ी और मकर संक्रांति दोनों ही सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं। लोहड़ी में सामूहिक रूप से अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर लोकगीत और परंपराएं निभाई जाती हैं, वहीं मकर संक्रांति पर दान, भोज और सामाजिक मेल-मिलाप के माध्यम से आपसी संबंधों को प्रगाढ़ किया जाता है। दोनों पर्व यह सिखाते हैं कि उत्सव का वास्तविक आनंद तभी है, जब वह सामूहिक हो और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चले।
शिक्षाप्रद और नैतिक दृष्टि
इन दोनों पर्वों से हमें कई जीवनोपयोगी शिक्षाएं मिलती हैं। लोहड़ी परिश्रम, धैर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान की सीख देती है, जबकि मकर संक्रांति त्याग, दान और सद्भाव का संदेश देती है। लोहड़ी जहां श्रम के बाद उत्सव मनाने की प्रेरणा देती है, वहीं मकर संक्रांति उस श्रम के फल को दूसरों के साथ बांटने की भावना को प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार दोनों पर्व मिलकर जीवन के संतुलित दर्शन को प्रस्तुत करते हैं।
निष्कर्ष
लोहड़ी और मकर संक्रांति अलग-अलग पर्व नहीं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक यात्रा के दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। एक पर्व परिवर्तन की पूर्व संध्या का उत्सव है, तो दूसरा नवचेतना और शुभारंभ का प्रतीक। दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि भारतीय परंपराएं प्रकृति, समाज और मानव मूल्यों को एक सूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। इन पर्वों को समझना और मनाना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और मानवीय संवेदनाओं को सशक्त करने का माध्यम है।
