मीरपुर में कूड़ा निस्तारण प्लांट पर बवाल, विधायक पर किसानों ने लगाए गंभीर आरोप

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जन वाणी न्यूज़ 

मीरपुर में कूड़ा निस्तारण प्लांट पर बवाल, विधायक पर किसानों ने लगाए गंभीर आरोप

दो महीने से सुलग रहा विरोध; पुलिस-ग्रामीण टकराव के बीच जनप्रतिनिधियों की सक्रियता से बढ़ी सियासी सरगर्मी

रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता

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गाजियाबाद। मीरपुर गांव में प्रस्तावित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) प्लांट को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। करीब दो महीनों से जारी विरोध प्रदर्शन उस समय और भड़क गया, जब प्रदर्शनकारियों को हटाने पहुंची पुलिस और किसानों के बीच तीखी झड़प हो गई। बल प्रयोग के आरोपों के साथ अब क्षेत्रीय विधायक की कथित भूमिका को लेकर भी विवाद गहराता दिख रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें जबरन हटाने के लिए पुलिस ने बर्बरता दिखाई, जबकि प्रशासन का कहना है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केवल सीमित बल का प्रयोग किया गया।

क्या है पूरा मामला?

मीरपुर में लगभग 120 बीघा जमीन पर प्रतिदिन करीब 2000 टन कचरे के निस्तारण की क्षमता वाला प्लांट बनाया जा रहा है। योजना के तहत प्लास्टिक, जैविक कचरा और अन्य अपशिष्ट को अलग कर मशीनों से प्रोसेस किया जाएगा।

लेकिन गांव के लोगों को आशंका है कि प्लांट शुरू होने पर क्षेत्र में बदबू, प्रदूषण और बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। उनका कहना है कि इतनी बड़ी जमीन पर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज या अन्य जनहित की सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए थीं।

ग्रामीणों का आरोप — वादाखिलाफी और धोखे की भावना

किसान पवन कुमार का कहना है कि वर्ष 2012 से इस परियोजना का विरोध हो रहा है। उनके अनुसार शुरुआत में गांव वालों को डिग्री कॉलेज और आधुनिक सुविधाओं का भरोसा दिया गया था, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि विकास के नाम पर गांव को कूड़ा केंद्र में बदला जा रहा है।

ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि नगर अधिकारियों के साथ बैठक में बातचीत पूरी होने तक निर्माण रोकने का आश्वासन दिया गया था, परंतु “पीछे के रास्ते” से काम जारी रखा गया।

“कूड़ा घर हटाओ, अस्पताल बनाओ” बना आंदोलन का नारा

किसान अरुण त्यागी ने स्पष्ट कहा कि गांव के बीच कूड़ा निस्तारण केंद्र स्वीकार्य नहीं है। ग्रामीण नीरज का दावा है कि यह प्लांट आसपास की बड़ी आबादी को प्रभावित करेगा।

उनके अनुसार, सैकड़ों किसान शांतिपूर्वक धरने पर बैठे थे, लेकिन पुलिस ने लाठियां चलाकर उन्हें हिरासत में लिया। देर रात कागजी प्रक्रिया के बाद अधिकांश लोगों को छोड़ दिया गया।

विधायक पर गंभीर आरोप, किसानों ने बदले रुख का लगाया दावा

किसान प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय विधायक नंदकिशोर गुर्जर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कुछ दिन पहले आधा दर्जन गांवों के किसान एकत्र होकर गनौली गांव स्थित विधायक के आवास पर पहुंचे थे, जहां कथित रूप से विधायक ने उन्हें भरोसा दिलाया था—“मैं तुम्हारे साथ हूं, मजबूती से धरना प्रदर्शन कीजिए।”

अब किसानों का आरोप है कि बाद में उन्हीं के कहने पर पुलिस ने कार्रवाई की और लाठियां चलाईं। प्रतिनिधियों का दावा है कि महिला और पुरुष किसानों पर पूर्व नियोजित तरीके से बल प्रयोग कराया गया।

हालांकि इन आरोपों पर विधायक की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधि का पक्ष आता है, तो विवाद की दिशा बदल सकती है।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री से आंदोलन को मिला बल

मंगलवार दोपहर आंदोलन ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब श्रीकांत त्यागी, सचिन शर्मा और मनोज जाटव भारी संख्या में अपने समर्थकों के साथ धरना स्थल पर पहुंचे। नेताओं ने किसानों के बीच पहुंचकर आंदोलन को खुला समर्थन दिया और पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा की।

नेताओं ने इसे किसानों की आवाज दबाने का प्रयास बताते हुए कहा कि निहत्थे किसानों और महिला प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग बेहद चिंताजनक है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ, तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

झड़प में कई घायल होने का दावा

रविवार को हालात उस समय बिगड़े जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने का प्रयास किया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, इससे भीड़ भड़क गई और माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया।

ग्रामीणों का दावा है कि करीब 25 लोग घायल हुए, जिनमें महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं। एक बुजुर्ग महिला के बेहोश होने, एक महिला के सिर में गंभीर चोट लगने और एक ग्रामीण का कूल्हा टूटने की बात भी सामने आई है।

पुलिस-प्रशासन का पक्ष

अधिकारियों का कहना है कि लाठीचार्ज नहीं किया गया, बल्कि केवल “हल्का बल प्रयोग” किया गया ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे। प्रशासन परियोजना को शहरी कचरा प्रबंधन के लिए आवश्यक बता रहा है।

परियोजना की पृष्ठभूमि

इस प्लांट का शिलान्यास 12 दिसंबर 2020 को किया गया था और इस पर लगभग 1728 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर विरोध लगातार जारी है।

हिरासत के बाद फिर धरने पर लौटे किसान

घटना के बाद पुलिस कई किसानों को हिरासत में लेकर गई थी, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। अगले ही दिन किसान फिर धरने पर बैठ गए, जिससे स्पष्ट है कि आंदोलन फिलहाल थमने वाला नहीं है।

आगे क्या?

मामला अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। एक ओर प्रशासन इसे शहर की जरूरत बता रहा है, तो दूसरी ओर ग्रामीण अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरे का हवाला देते हुए पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

अब इस विवाद में जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और विधायक पर लगे आरोपों ने मामले को और राजनीतिक बना दिया है। यदि जल्द संवाद की ठोस पहल नहीं हुई, तो मीरपुर का यह विवाद बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। फिलहाल गांव में तनाव बरकरार है और सभी की नजरें प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और किसानों के अगले कदम पर टिकी हैं।

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