लोनी में ‘फर्जी पत्रकारिता’ का काला साम्राज्य: आई-कार्ड, कैमरा और माइक बने उगाही के हथियार

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जन वाणी न्यूज़

लोनी में ‘फर्जी पत्रकारिता’ का काला साम्राज्य: आई-कार्ड, कैमरा और माइक बने उगाही के हथियार

रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता / जन वाणी न्यूज़

गाजियाबाद । जनपद की लोनी तहसील में पत्रकारिता का चेहरा तेजी से धूमिल होता नजर आ रहा है। बिना किसी प्रशिक्षण, डिग्री या नैतिक समझ के ‘फर्जी पत्रकारों’ की बाढ़ ने न केवल मीडिया की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली का एक संगठित तंत्र खड़ा कर दिया है। हालात यह हैं कि अब ‘प्रेस’ का आई-कार्ड खबर दिखाने का नहीं, बल्कि दबाव बनाकर सौदेबाजी करने का सबसे बड़ा औजार बन चुका है।

लोनी क्षेत्र में इन दिनों पत्रकारिता के नाम पर चल रहे खेल ने खतरनाक मोड़ ले लिया है। दो से दस हजार रुपये में मिलने वाले तथाकथित ‘प्रेस आई-कार्ड’ और सस्ते डिजिटल उपकरणों के सहारे कोई भी खुद को रिपोर्टर, ब्यूरो चीफ या स्टेट हेड घोषित कर रहा है। बिना किसी सत्यापन और जवाबदेही के तैयार हो रही यह ‘फौज’ अब सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों, स्कूलों और निर्माण स्थलों पर पहुंचकर वीडियो बनाती है और फिर उसे हथियार बनाकर ‘सेटिंग’ का खेल शुरू करती है।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अफसरों, ठेकेदारों और कारोबारियों में एक अदृश्य डर का माहौल है। आरोप है कि कई मामलों में मामूली खामियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और फिर खबर चलाने या वायरल करने की धमकी देकर मोटी रकम वसूली जाती है। यह पूरा खेल खुलेआम चल रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा हुआ है।

चौंकाने वाली बात यह भी है कि इस कथित पत्रकारिता के गिरोह में कई ऐसे चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। ‘हिस्ट्रीशीटर-टर्न-रिपोर्टर’ की यह नई जमात अब पुलिस और प्रशासन तक को निशाने पर लेने से नहीं चूक रही। थानों में घुसकर दबाव बनाना, अधिकारियों को कैमरे के सामने कटघरे में खड़ा करना और फिर समझौते की जमीन तैयार करना, यह सब एक सुनियोजित पैटर्न के तहत हो रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है। बिना किसी एडिटोरियल नियंत्रण और लाइसेंसिंग के ‘डिजिटल न्यूज चैनल’ की भरमार हो गई है, जहां न तो खबर की पुष्टि होती है और न ही किसी आचार संहिता का पालन। ‘व्यूज’ और ‘वायरल’ की होड़ में झूठ, आधा-सच और सनसनी को परोसा जा रहा है, जिससे आम जनता भी भ्रमित हो रही है।

हालांकि, यह भी सच है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई जिम्मेदार और ईमानदार पत्रकार भी काम कर रहे हैं, लेकिन फर्जी और ब्लैकमेलिंग करने वाले तत्वों की भीड़ ने पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। असली पत्रकारों की मेहनत और विश्वसनीयता पर भी अब सवाल उठने लगे हैं।

कानूनी प्रावधान मौजूद होने के बावजूद इन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है। जालसाजी, धोखाधड़ी और उगाही जैसी धाराएं लागू हो सकती हैं, लेकिन डिजिटल मीडिया के लिए स्पष्ट और सख्त नियामक ढांचे की कमी इस समस्या को बढ़ा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि ‘मीडिया पहचान’ की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल सत्यापन से जोड़ा जाए। हर प्रेस आई-कार्ड को एक यूनिक रजिस्ट्रेशन से लिंक किया जाए और दुरुपयोग पर सख्त, गैर-जमानती कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही पत्रकार संगठनों को भी आगे आकर अपनी आचार संहिता लागू करनी होगी।

स्पष्ट है कि यदि समय रहते इस ‘फर्जी पत्रकारिता’ के नेटवर्क पर लगाम नहीं कसी गई, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अंदर से खोखला हो जाएगा। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन, सरकार और समाज मिलकर इस संक्रमण को खत्म करें, ताकि पत्रकारिता फिर से अपनी मूल भूमिका—सच दिखाने और जनहित की आवाज बनने—की ओर लौट सके।

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