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शिवमय हुआ भारत: महाशिवरात्रि पर आस्था का ज्वार, शिवालयों में उमड़ा जनसैलाब








ब्रह्म मुहूर्त से अंतहीन कतारें, दुल्हन से सजे मंदिर; कड़ी सुरक्षा और ट्रैफिक डायवर्जन के बीच गूंजा “हर-हर महादेव”
रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता
नई दिल्ली/वाराणसी/उज्जैन/गाजियाबाद। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर मानो पूरा भारत शिवमय हो उठा। शहरों से लेकर गांवों तक, घाटों से लेकर गलियों तक—हर ओर सिर्फ एक ही स्वर सुनाई दिया, “हर-हर महादेव।” ऐसा प्रतीत हुआ जैसे आस्था स्वयं जनधारा बनकर सड़कों पर उतर आई हो।
ब्रह्म मुहूर्त से ही देशभर के शिवालयों के बाहर श्रद्धालुओं की अंतहीन कतारें लग गईं। कोई नंगे पांव पहुंचा, कोई कलश लेकर, तो कोई परिवार सहित—हर चेहरे पर एक ही भाव था, अटूट विश्वास। घंटों प्रतीक्षा के बाद भी श्रद्धालुओं का उत्साह तनिक कम नहीं हुआ; भक्ति का यह उफान एक आध्यात्मिक उत्सव में बदल गया।
देश के प्रमुख शिवधाम—काशी विश्वनाथ मंदिर, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ मंदिर और सोमनाथ मंदिर—में श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मंदिर परिसर ही नहीं, आसपास की सड़कें भी भक्ति की धारा में बहती नजर आईं। वैदिक मंत्रोच्चार, मंदिरों की घंटियां और जयकारों की गूंज ने वातावरण को अलौकिक बना दिया।
दूधेश्वरनाथ मंदिर में उमड़ा विश्वास का सागर
दूधेश्वर नाथ मंदिर में सुबह की पहली किरण के साथ ही भक्तों का रेला उमड़ पड़ा। दर्शन के लिए लगी लंबी कतारें आस्था की गहराई का प्रमाण बन गईं। श्रद्धालुओं ने बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित कर भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया और पूर्ण विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
मंदिर परिसर में भक्ति का ऐसा स्पंदन था जिसे शब्दों में बांधना कठिन था—धूप की सुगंध, मंत्रों की ध्वनि और झुके हुए शीश यह बता रहे थे कि आस्था जब जागती है, तो वह जनसागर बन जाती है।
सुरक्षा के अभेद घेरे और ट्रैफिक डायवर्जन के बीच सहज दर्शन
अभूतपूर्व भीड़ को देखते हुए देशभर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए। प्रमुख मंदिरों के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहा, बैरिकेडिंग की गई और हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी गई।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कई शहरों में ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया गया, जिससे यातायात नियंत्रित रहा और दर्शन व्यवस्था बाधित न हो। आस्था और प्रशासनिक सजगता का यह संतुलन बड़े धार्मिक आयोजनों की परिपक्वता को दर्शाता है।
दुल्हन से सजे देवालय, भक्ति से जगमगाया राष्ट्र
मंदिरों को फूलों, रंगीन रोशनियों और दीपमालाओं से इस प्रकार सजाया गया मानो देवालय स्वयं उत्सव का स्वरूप बन गए हों। विशेष श्रृंगार, महाआरती और रुद्राभिषेक ने हर श्रद्धालु के मन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया। रातभर भजन-कीर्तन और जागरण के बीच पूरा वातावरण शिवनाम में डूबा रहा।
भंडारे, सेवा और समरसता—आस्था का सामाजिक रूप
जगह-जगह लगे भंडारों में हजारों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। यहां न कोई परिचय था, न भेद—सिर्फ भक्ति थी। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की उस आत्मा को प्रकट करता है जहां आस्था सबको एक सूत्र में बांध देती है।
जब त्योहार बन जाए राष्ट्रीय चेतना
पूजन सामग्री और फूलों के बाजारों में देर रात तक रौनक रही। छोटे व्यापारियों से लेकर कारीगरों तक, हर किसी ने इस पर्व की ऊर्जा को महसूस किया। महाशिवरात्रि ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि भारत में त्योहार केवल तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का उत्सव होते हैं।
निष्कर्ष:
अंतहीन कतारें, गूंजते मंत्र, झुके हुए शीश, कड़ी सुरक्षा और ट्रैफिक की सुनियोजित व्यवस्था—इन सबके बीच महाशिवरात्रि ने एक ही संदेश दिया: जब आस्था उमड़ती है, तो वह सीमाएं नहीं देखती, बल्कि पूरे राष्ट्र को शिवमय कर देती है। सच ही तो है—इस रात केवल मंदिरों में दीप नहीं जले, बल्कि करोड़ों हृदयों में विश्वास का प्रकाश प्रज्वलित हुआ।
