जन वाणी न्यूज़
गणतंत्र दिवस पर इस्तीफा, देश में उठा वैचारिक भूचाल
यूजीसी नियम, शंकराचार्य विवाद और प्रशासनिक कार्रवाई पर आमने-सामने खड़े पक्ष
रविन्द्र बंसल
बरेली/लखनऊ।
77वें गणतंत्र दिवस के दिन बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का पद से इस्तीफा सामने आते ही प्रशासनिक, धार्मिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई। इस्तीफे की वजह के रूप में यूजीसी के नए नियमों और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ हुई कथित मारपीट को बताया गया है। यह प्रकरण केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने शासन-प्रशासन, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक भावनाओं के टकराव को उजागर कर दिया है।
इस्तीफे का पत्र बना बहस की धुरी
इस्तीफे के साथ लिखे गए पत्र में अधिकारी ने इसे समाज की भावनाओं को आहत करने वाली घटना करार दिया। पत्र में कहा गया कि ऐसी घटनाएं किसी भी सामान्य नागरिक को भीतर तक झकझोर देती हैं और यह संदेश जाता है कि साधु-संतों और धार्मिक परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है। इस पत्र के सार्वजनिक होते ही मामला प्रशासनिक गलियारों से निकलकर सियासी और सामाजिक विमर्श का विषय बन गया।
यूजीसी नियम और ‘सर्टिफिकेट’ विवाद
विवाद की जड़ में यूजीसी का नया नियम और शंकराचार्य की वैधानिक मान्यता से जुड़ा प्रश्न भी सामने आया। समर्थकों का कहना है कि प्रशासन को किसी धार्मिक पदाधिकारी से प्रमाणपत्र मांगने का अधिकार नहीं है, जबकि प्रशासनिक पक्ष नियमों के अनुपालन की बात करता रहा। इसी खींचतान के बीच शिष्यों के साथ हुई कथित सख्ती ने आग में घी डालने का काम किया।
शंकराचार्यों का समर्थन, तीखे बयान
द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती सहित तीनों शंकराचार्यों ने अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में बयान दिया। उन्होंने कहा कि निर्दोष ब्राह्मणों के साथ हुई मारपीट निंदनीय है और धार्मिक परंपराओं पर आघात का परिणाम दूरगामी हो सकता है। जबलपुर में नर्मदा जन्मोत्सव कार्यक्रम के दौरान दिए गए बयान ने मामले को और व्यापक बना दिया।
धरना, तिरंगा और राजनीतिक संकेत
इधर, इधर (माघ) मेले में शिविर के बाहर धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा तिरंगा फहराया जाना भी प्रतीकात्मक संदेश के तौर पर देखा गया। उनके बयान—कि अगर कुछ नेताओं का दबदबा चलता तो स्थिति और अलग होती—ने राजनीतिक संकेतों को हवा दी और सत्ता-विपक्ष दोनों में हलचल मचा दी।
प्रशासन बनाम आस्था की बहस
यह मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई बनाम धार्मिक आस्था की संवेदनशीलता के सवाल में तब्दील हो चुका है। एक ओर नियमों के पालन की दलील है, तो दूसरी ओर परंपराओं और सम्मान की बात। इस्तीफा इस टकराव का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है।
आगे की राह पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकरण का समाधान संवाद और संतुलन से ही संभव है। अन्यथा, प्रशासनिक फैसले सामाजिक तनाव को जन्म दे सकते हैं और धार्मिक संस्थाओं के साथ टकराव बढ़ सकता है। फिलहाल, यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए अग्निपरीक्षा बन गया है—जहां हर कदम का असर दूर तक महसूस किया जाएगा।
