**लोनी भी क्रांतिकारियों की धरती रही है! इतिहास के हाशिये पर धकेले गए उन नामों की पुकार**

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

🇮🇳 गणतंत्र दिवस विशेषांक – विशेष लीड

**लोनी भी क्रांतिकारियों की धरती रही है!

इतिहास के हाशिये पर धकेले गए उन नामों की पुकार**

गाजियाबाद/लोनी । जब भी भारत की आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र होता है, तो कुछ गिने-चुने शहरों और नामों तक इतिहास सिमट जाता है। लेकिन यह अधूरा सच है। आज़ादी की असली लड़ाई देश के गांवों में लड़ी गई—और गाजियाबाद जनपद का लोनी क्षेत्र उसी अनकही क्रांति का जीवंत उदाहरण है।

यह वही लोनी है, जहाँ 1857 की पहली क्रांति की चिंगारी पहुँची, जहाँ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किसानों और युवाओं ने सीना ताना, और जहाँ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गांव-गांव से आवाज़ उठी—“अंग्रेजों, भारत छोड़ो!”

🔥 1857: जब लोनी ने बगावत का झंडा उठाया

मेरठ छावनी से उठी क्रांति की आग लोनी, मीरपुर हिन्दू, बंथला, पावी, खजूरी और टीला मोड़ क्षेत्र तक फैल गई।
अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ:

लगान वसूली रोकी गई

चौकियों पर हमले हुए

क्रांतिकारियों को शरण, भोजन और गुप्त रास्ते दिए गए

इसके जवाब में अंग्रेजों ने गांव जलाए, संपत्तियां जब्त कीं और युवकों को सरेआम फांसी व गोली का शिकार बनाया।
कई नाम इतिहास में दर्ज नहीं हुए, लेकिन उनका खून इसी मिट्टी में समाया है।

लोनी के वे नाम, जिन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिए

> ये नाम स्थानीय इतिहास, परिवारों की स्मृति और जनपद स्तरीय स्वतंत्रता सेनानी संदर्भों में सुरक्षित हैं। यह सूची अंतिम नहीं—बल्कि शुरुआत है।

 

◼️ पं. सुंदरलाल शर्मा

(लोनी–गाजियाबाद अंचल)
ग्रामीण चेतना के प्रखर वाहक।
1857 के बाद राष्ट्रीय विचारधारा को गांवों तक पहुँचाया।
किसानों को अंग्रेजी अन्याय के विरुद्ध संगठित किया।

◼️ चौधरी फतेह सिंह त्यागी

गांव: मीरपुर हिन्दू (लोनी)
असहयोग आंदोलन के सक्रिय सिपाही।
विदेशी कपड़ों की होली जलाई, जेल गए, मगर झुके नहीं।
युवाओं को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ा।

◼️ पं. हरदत्त शर्मा

क्षेत्र: बंथला
1857 के विद्रोहियों के लिए शरण और रसद की व्यवस्था।
अंग्रेजी दमन का शिकार बने, संपत्ति जब्त हुई।
आज भी लोक-स्मृति में विद्रोह के प्रतीक।

◼️ बाबू रामसहाय

गांव: पावी
सविनय अवज्ञा आंदोलन में अग्रिम पंक्ति।
कर वसूली और नमक कानून के खिलाफ खुला प्रतिरोध।
जेल यातनाएँ झेलीं, जीवन देश को समर्पित।

◼️ लाला किशनलाल

गांव: खजूरी
भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत क्रांतिकारी।
संदेशवाहक, गुप्त ठिकानों के संचालक।
गिरफ्तारी के बाद बीमारी से मृत्यु—परिवार आज भी शहीद मानता है।

🕯️ गांव-गांव में जलती रही आज़ादी की मशाल

मीरपुर हिन्दू – असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन का केंद्र

बंथला – 1857 में किसान विद्रोह की धुरी

पावी – क्रांतिकारी संदेशों और प्रतिरोध की कड़ी

खजूरी – भूमिगत आंदोलन का सुरक्षित ठिकाना

टीला मोड़ क्षेत्र – गुप्त मार्ग और सहयोग का मजबूत जाल

🇮🇳 गणतंत्र दिवस का सच्चा अर्थ

26 जनवरी सिर्फ परेड और भाषण का दिन नहीं है।
यह उन लोगों को याद करने का दिन है— जिनके नाम सरकारी फाइलों में नहीं,
लेकिन भारत के भविष्य में दर्ज हैं।

लोनी के ये क्रांतिकारी बताते हैं कि
देशभक्ति किसी मंच की मोहताज नहीं होती।

 

नौजवानों के नाम सीधा सवाल

क्या हमें अपने गांवों के शहीदों के नाम पता हैं?
क्या हमने उनकी कहानियाँ सुनी हैं?

अगर नहीं—तो यह आज़ादी अधूरी समझी जाएगी।

 

> “जो इतिहास में नहीं लिखे गए, वही इतिहास बनाते हैं।
लोनी के क्रांतिकारी उसी अमर कथा का हिस्सा हैं।”

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