रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
**यूपी में कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल
गोलीकांड के कई दिन बाद भी मुख्य आरोपी फरार, पीड़ितों को मिल रहीं जान से मारने की धमकियां*

लखनऊ/गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गाजियाबाद के ट्रॉनिका सिटी थाना क्षेत्र में हुए गोलीकांड को कई दिन बीत जाने के बावजूद मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रहा है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि मुख्य आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहा है और मुकदमा वापस लेने के लिए लगातार जान से मारने की धमकियां दे रहा है।
दिनांक 16 जनवरी 2026 की रात लगभग 10:30 बजे, मीरपुर हिन्दू गांव निवासी सुनील त्यागी पुत्र स्व. शिबका अपने परिजनों के साथ लौट रहे थे। इसी दौरान पुराने विवाद के चलते आरोपियों ने अवैध हथियारों से ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली चलने से इलाके में दहशत फैल गई। पीड़ितों के अनुसार हमलावरों की नीयत सीधे हत्या करने की थी, हालांकि परिजन किसी तरह जान बचाने में सफल रहे।
घटना के तुरंत बाद ट्रॉनिका सिटी थाने में हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन मुख्य आरोपी अब भी फरार है, जो इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को उजागर करता है।
पीड़ित परिवार का कहना है कि
> “मुख्य आरोपी और उसके सहयोगी हमें लगातार फोन और आमने-सामने धमकी दे रहे हैं कि अगर मुकदमा वापस नहीं लिया तो पूरे परिवार को खत्म कर दिया जाएगा।”
परिवार का आरोप है कि उन्होंने स्थानीय पुलिस, थाना प्रभारी और अन्य अधिकारियों से कई बार सुरक्षा और कार्रवाई की गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। उल्टा, पीड़ित पक्ष खुद को पुलिस से भी भयभीत महसूस कर रहा है, क्योंकि आरोपी बेखौफ हैं और कार्रवाई ठप है।
पुलिस की निष्क्रियता से परेशान होकर पीड़ितों ने अब एडिशनल पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायती पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई है। पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि मुख्य आरोपी की शीघ्र गिरफ्तारी नहीं हुई, तो किसी भी बड़ी घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस मामले ने प्रदेश-स्तर पर कानून व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है। सवाल यह है कि
जब गोली चलने और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराध में भी मुख्य आरोपी कानून की पकड़ से बाहर है, तो आम नागरिक खुद को सुरक्षित कैसे माने?
अब निगाहें शासन और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर टिकी हैं कि क्या पीड़ित परिवार को समय रहते न्याय मिलेगा, या फिर यह मामला भी सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगा।
