63 दिनों की भूख, फौलाद का संकल्प
आजादी की नींव में गुमनाम शहीद यतींद्रनाथ दास की अमर शहादत
रविन्द्र बंसल
✍️ गणतंत्र दिवस के अवसर पर विशेष लेख
आजादी के अमृत काल में जब देश तिरंगे के नीचे गर्व से खड़ा है, तब इतिहास के उन पन्नों को पलटना जरूरी हो जाता है जिन पर खून, भूख और असहनीय यातनाओं से लिखी गई कुर्बानियों की इबारत दर्ज है। इन्हीं पन्नों में एक नाम है— यतींद्रनाथ दास उर्फ ‘जतिन दा’, एक ऐसा क्रांतिकारी जिसने हथियार नहीं, अपने शरीर को ही संघर्ष का माध्यम बना लिया।
क्रांति का वह अध्याय, जिसे इतिहास ने कम पढ़ाया
25 वर्ष का वह नौजवान, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने घुटने टेकने के बजाय 63 दिनों का अनशन चुना। लाहौर जेल की अंधेरी कोठरी में, जहां शरीर से मांस गल चुका था, पसलियां बाहर दिखने लगी थीं और हिलने की ताकत भी नहीं बची थी—वह संकल्प अब भी अडिग था।
अंग्रेजों को लगा कि भूख इस क्रांतिकारी को तोड़ देगी। लेकिन वे भूल गए थे कि यह देह मिट्टी की नहीं, फौलाद के इरादों से बनी थी।
मानवता को शर्मसार करती औपनिवेशिक क्रूरता
जब अनशन से जतिन दा की हालत गंभीर हुई, तो अंग्रेजी जेल प्रशासन ने क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ दीं। नाक में जबरन नली डालकर दूध पिलाने की कोशिश की गई। नली खाने की नली के बजाय फेफड़ों में चली गई।
दूध फेफड़ों में भर गया। खून की उल्टियां, असहनीय पीड़ा, तड़पती सांसें—लेकिन अनशन नहीं टूटा।
13 सितंबर 1929, लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने देश की गरिमा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
मांग केवल एक थी—सम्मान
जतिन दा कोई माफी नहीं मांग रहे थे। न कोई विशेष सुविधा। उनकी सिर्फ एक मांग थी—
“भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार बंद किया जाए।”
यह लड़ाई पेट की नहीं, आत्मसम्मान की थी। यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, पूरी गुलाम कौम के स्वाभिमान का था।
जब देश रो पड़ा
जतिन दा की शहादत की खबर बाहर आई तो पूरा देश शोक में डूब गया।
लाहौर से कलकत्ता तक, हर रेलवे स्टेशन पर हजारों लोग फूलों के साथ खड़े थे।
कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से अधिक लोग शामिल हुए।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वयं उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया।
यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी—यह जनता का आक्रोश, सम्मान और श्रद्धा थी।
भगत सिंह के साथ शहीद, पर इतिहास में पीछे छूट गए
इतिहास अक्सर भगत सिंह की फांसी को याद करता है, लेकिन उस साथी को भूल जाता है जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा।
जतिन दा का बलिदान उस क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक था, जिसने आजादी की लड़ाई को नैतिक ऊंचाई दी।
“ कोई साधु नहीं हूं…”मैं
मृत्यु से पहले जतिन दा के शब्द आज भी रगों में आग भर देते हैं—
“मैं कोई साधु नहीं हूं, मैं एक साधारण इंसान हूं, जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।”
आज की पीढ़ी से सवाल
आज सवाल यह नहीं कि आजादी चरखे से आई या बंदूक से।
सवाल यह है कि क्या हम उन 63 दिनों की भूख की कीमत समझते हैं?
क्या हम जानते हैं कि जिस हवा में हम सांस लेते हैं, वह किसी की तपस्या और तड़प से खरीदी गई है?
नमन उन गुमनाम शहीदों को
यतींद्रनाथ दास जैसे शहीदों ने हमें सिखाया कि आजादी कोई खैरात नहीं, बल्कि बलिदानों की विरासत है।
आज जरूरत है कि नौजवान पीढ़ी इतिहास को सिर्फ पढ़े नहीं, महसूस करे।
यह लेख केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि जागरण का आह्वान है—
ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली हीरो कौन थे।
जतिन दा अमर रहें।
गुमनाम शहीदों को शत-शत नमन। 🇮🇳
