प्रयागराज महाकुंभ में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से कथित दुर्व्यवहार पर बवाल, संत समाज में आक्रोश—आस्था पर प्रशासनिक आघात

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धरने पर  ही पूजा करते शंकराचार्य

प्रयागराज । महाकुंभ के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ कथित प्रशासनिक दुर्व्यवहार ने देशभर में संत समाज और श्रद्धालुओं को झकझोर कर रख दिया है। पालकी (रथ) यात्रा रोके जाने के विरोध में शंकराचार्य जहां पुलिस द्वारा छोड़े गए स्थान पर ही धरने पर बैठ गए, वहीं पूरी रात कड़ाके की ठंड में उन्होंने 26 घंटे से अधिक समय तक अन्न-जल का त्याग कर दिया। यह घटनाक्रम अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे संतों के सम्मान, धार्मिक परंपरा और करोड़ों अनुयायियों की आस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।

सोमवार दोपहर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक प्रशासन स्वयं आकर क्षमा नहीं मांगता और सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित नहीं करता, तब तक वे आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, “शंकराचार्य परंपरा में जब भी स्नान हुआ है, पालकी से ही हुआ है। यह कोई नई मांग नहीं, सदियों से चली आ रही परंपरा है।” उन्होंने यह भी दोहराया कि प्रशासन द्वारा सम्मान और प्रोटोकॉल के साथ व्यवहार नहीं किए जाने तक वे गंगा स्नान नहीं करेंगे और फुटपाथ पर ही रहेंगे।

आस्था बनाम प्रशासनिक हठधर्मिता?
इस पूरे प्रकरण ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन संवाद के रास्ते को छोड़कर शक्ति-प्रदर्शन के रास्ते पर चल पड़ा है। संत समाज का कहना है कि शंकराचार्य जैसे प्रतिष्ठित धर्मगुरु के साथ सड़क पर बैठने की नौबत आना स्वयं में प्रशासनिक असंवेदनशीलता का प्रमाण है। यदि प्रशासन चाहता, तो एक संवाद, एक बैठक और सम्मानजनक बातचीत से समाधान निकाला जा सकता था। लेकिन ऐसा न कर यह संदेश दिया गया कि परंपरा और आस्था को दरकिनार कर दिया गया।

लाखों अनुयायियों को पहुंची गहरी ठेस
शंकराचार्य के अनुयायियों और संत समाज में इस घटना को लेकर तीखा आक्रोश है। उनका कहना है कि यह किसी एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, संत समाज और उन लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं पर आघात है, जो शंकराचार्य को अपना धर्मगुरु मानते हैं। सोशल मीडिया से लेकर अखाड़ों तक इस घटना की तीखी आलोचना हो रही है।

प्रशासन का पक्ष
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि महाकुंभ में भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा सर्वोपरि है, इसलिए कुछ प्रतिबंध लगाए गए। हालांकि आलोचकों का सवाल है कि जब अन्य परंपराओं और प्रोटोकॉल का सम्मान किया जाता है, तो शंकराचार्य की सदियों पुरानी पालकी परंपरा पर अचानक आपत्ति क्यों?

संत समाज की चेतावनी
संत समाज ने साफ शब्दों में चेताया है कि यदि इस मामले में शीघ्र सम्मानजनक समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन व्यापक रूप ले सकता है। उनका कहना है कि धर्मगुरुओं से टकराव किसी भी सूरत में उचित नहीं और इसका सीधा असर सामाजिक सौहार्द पर पड़ता है।

निष्कर्ष
प्रयागराज महाकुंभ जैसे आस्था के महासंगम में शंकराचार्य का फुटपाथ पर धरना और अन्न-जल त्याग करना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह समय टकराव का नहीं, संवाद और सम्मान का है। क्योंकि संतों का अपमान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की आस्था को आहत करता है—और यही इस पूरे प्रकरण की सबसे गंभीर और दिल दहला देने वाली सच्चाई है।

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