रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
जब दिल्ली इंद्रप्रस्थ थी: राजधानी रचने वालों के नाम पर आज एक भी सड़क क्यों नहीं?
महाभारतकालीन दिल्ली से आधुनिक राजधानी तक—इतिहास का बड़ा विरोधाभास
दिल्ली । जिसे आज देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है, उसका इतिहास केवल मुगल या सल्तनत काल से शुरू नहीं होता। इसका मूल महाभारत काल में निहित है, जब यह क्षेत्र खांडवप्रस्थ कहलाता था। यही खांडवप्रस्थ, पांडवों के पुरुषार्थ, परिश्रम और नगर निर्माण कला से विकसित होकर इंद्रप्रस्थ बना—एक समृद्ध, सुव्यवस्थित और वैभवशाली राजधानी।
महाभारत के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर के हस्तिनापुर के सम्राट बनने के बाद, पांडवों को राजधानी हेतु खांडवप्रस्थ दिया गया। श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन और मयदानव की स्थापत्य कला से इंद्रप्रस्थ एक आदर्श नगर के रूप में खड़ा हुआ। यहीं से न्याय, धर्म और राजकाज का संचालन हुआ।
लेकिन आज, जब दिल्ली की सड़कों पर नजर जाती है, तो एक विचित्र प्रश्न खड़ा होता है—
क्या राजधानी बसाने वाले पांडव दिल्ली के इतिहास से बाहर कर दिए गए?
दिल्ली की सड़कें: बादशाहों के नाम, पर इंद्रप्रस्थ के नायकों का नाम नहीं
आज दिल्ली की प्रमुख सड़कों और इलाकों पर नजर डालें—
अकबर रोड
औरंगज़ेब रोड (अब ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रोड)
शेरशाह सूरी मार्ग
तुगलक रोड
बाबर लेन
हुमायूं रोड
यहाँ तक कि उन शासकों के नाम भी सड़कों पर अंकित रहे, जिनका शासन आक्रांताओं, अत्याचारों और धार्मिक दमन के लिए जाना जाता है।
परंतु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि—
न युधिष्ठिर मार्ग
न भीम नगर
न अर्जुन विहार
न द्रौपदी पथ
न इंद्रप्रस्थ स्मारक क्षेत्र
दिल्ली की किसी प्रमुख सड़क, कॉलोनी या प्रशासनिक क्षेत्र में पांडवों या महाभारतकालीन किसी महापुरुष का नाम तक नहीं।
इंद्रप्रस्थ: दिल्ली का पहला योजनाबद्ध नगर
इतिहासकारों और पुरातात्विक संकेतों के अनुसार—
आज का पुराना किला क्षेत्र प्राचीन इंद्रप्रस्थ का हिस्सा माना जाता है
यमुना तट पर बसा यह नगर प्रशासन, रक्षा और संस्कृति का केंद्र था
सभा भवन, राजमार्ग, जल प्रबंधन और आवासीय योजनाएँ उस काल में उन्नत थीं
यानी जिस भूमि पर आज आधुनिक दिल्ली खड़ी है, उसकी राजनीतिक राजधानी बनने की नींव महाभारत काल में ही रख दी गई थी।
तो फिर सवाल—पांडवों को क्यों भुला दिया गया?
इस ऐतिहासिक उपेक्षा के पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं—
1. औपनिवेशिक और सल्तनती दृष्टिकोण
दिल्ली का आधुनिक नामकरण अधिकतर ब्रिटिश काल में हुआ, जहाँ प्राथमिकता मुगल और सल्तनत शासकों को दी गई।
2. ‘मिथक’ बताकर इतिहास से दूरी
महाभारत को लंबे समय तक “पौराणिक” कहकर प्रशासनिक इतिहास से अलग कर दिया गया, जबकि आज इसके ऐतिहासिक साक्ष्य लगातार सामने आ रहे हैं।
3. सांस्कृतिक आत्मविस्मृति
जिस सभ्यता ने दिल्ली को पहली बार राजधानी का स्वरूप दिया, उसी को स्मृति से बाहर कर देना एक गहरी सांस्कृतिक चूक मानी जाती है।
राजधानी का नैतिक उत्तराधिकार किसका?
दिल्ली को जिसने भी राजधानी बनाया—चाहे वह राजा रहा हो या बादशाह—उसने इंद्रप्रस्थ की विरासत पर ही राज किया। फिर भी उस मूल विरासत के रचयिताओं को सम्मान न मिलना सवाल खड़े करता है—
क्या इतिहास चयनात्मक हो सकता है?
क्या आक्रांताओं के नाम स्मरणीय हैं, पर सभ्यता रचने वाले नहीं?
अब भी समय है—इतिहास को संतुलित करने का
आज जब देश सभ्यतागत पुनर्जागरण की बात कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि—
दिल्ली में महाभारतकालीन नामों पर सड़कें और क्षेत्र चिन्हित हों
इंद्रप्रस्थ को ऐतिहासिक पहचान मिले
नई पीढ़ी को बताया जाए कि दिल्ली केवल सल्तनतों की नहीं, धर्म और न्याय की राजधानी भी रही है
निष्कर्ष
दिल्ली केवल मुगलों, तुगलकों या अंग्रेजों की राजधानी नहीं रही—
यह सबसे पहले पांडवों की राजधानी थी।
और जब राजधानी का इतिहास लिखा जाए, तो नींव रखने वालों को विस्मृत करना सबसे बड़ा अन्याय है।
अब सवाल केवल इतिहास का नहीं, सांस्कृतिक न्याय का भी है।
