रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
शिक्षा नहीं, खुला लूटतंत्र: लोनी में निजी स्कूल बने अभिभावकों के शोषण का संगठित अड्डा
— नियम-कानून ठेंगे पर, प्रशासन मौन; बच्चों का भविष्य बंधक
लोनी । जिस शिक्षा को समाज निर्माण की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, वही शिक्षा आज लोनी क्षेत्र में निजी स्कूल माफिया के हाथों बंधक बन चुकी है। निजी शिक्षण संस्थानों ने पढ़ाई को सेवा नहीं बल्कि बेशर्म मुनाफाखोरी का जरिया बना लिया है। हालात इतने भयावह हैं कि अभिभावकों के पास बच्चों को पढ़ाने के लिए लुटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
किताबें नहीं, कमीशन का खेल
निजी स्कूलों द्वारा अपनी मनपसंद दुकानों से ही किताबें खरीदने की बाध्यता थोपना अब आम बात हो गई है। वही किताबें जो बाजार में आधे दाम पर उपलब्ध हैं, स्कूलों द्वारा दोगुने-तिगुने दामों पर बेची जा रही हैं। यह सीधा-सीधा आर्थिक शोषण नहीं तो और क्या है?
फीस नहीं, जबरन वसूली
ट्यूशन फीस के अतिरिक्त एनुअल चार्ज, बिल्डिंग फंड, डेवलपमेंट फीस, एक्टिविटी फंड, स्मार्ट क्लास चार्ज जैसी अंतहीन सूची थमाकर अभिभावकों की जेब काटी जा रही है। कई स्कूलों में तो शुल्क बढ़ोतरी का कोई नोटिस, कोई औचित्य और कोई हिसाब तक नहीं दिया जाता।
मानक शून्य, लेकिन मान्यता जैसे स्थायी
लोनी की हर गली-मोहल्ले में चल रहे अधिकतर निजी स्कूल शैक्षिक मानकों की खुली अवहेलना कर रहे हैं।
न पर्याप्त कमरे
न खेल मैदान
न प्रशिक्षित शिक्षक
न अग्नि सुरक्षा
न शौचालयों की समुचित व्यवस्था
फिर भी ये स्कूल वर्षों से बिना बाधा संचालित हैं। सवाल उठता है—आखिर किसके संरक्षण में यह सब चल रहा है?
प्रशासनिक मौन: लापरवाही या मिलीभगत?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शिकायतों के बावजूद शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की चुप्पी निजी स्कूल संचालकों के हौसले और बढ़ा रही है। अभिभावकों का आरोप है कि जब भी शिकायत की जाती है, तो या तो फाइलें दबा दी जाती हैं या जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाती है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
इस संबंध में जब अधिकारियों से सवाल किया गया, तो शिक्षा विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—
“शुल्क निर्धारण और किताबों की बिक्री को लेकर नियम बने हैं। यदि कोई स्कूल उनका उल्लंघन कर रहा है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी।”
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि न जांच दिखाई देती है और न कार्रवाई, जिससे यह बयान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
शिक्षा का अधिकार या लूट का लाइसेंस?
यह बड़ा सवाल है कि जब सरकार एक ओर शिक्षा के अधिकार की बात करती है, तो दूसरी ओर निजी स्कूलों को खुला लूट लाइसेंस क्यों दिया जा रहा है? क्या गरीब और मध्यम वर्ग का बच्चा अच्छी शिक्षा का हकदार नहीं है?
अब निर्णायक हस्तक्षेप जरूरी
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का साफ कहना है कि यदि अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा पूरी तरह व्यापारियों के हाथों गिरवी हो जाएगी।
अवैध शुल्क वसूली पर तत्काल रोक
निजी स्कूलों की व्यापक जांच
नियम उल्लंघन पर मान्यता रद्द
अभिभावकों को शिकायत का प्रभावी मंच
इन मांगों पर अमल किए बिना सुधार असंभव है।
लोनी में शिक्षा आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। अब यह प्रशासन पर निर्भर करता है कि वह मूकदर्शक बना रहता है या अभिभावकों और बच्चों के हित में ठोस कार्रवाई करता है।
