भ्रष्टाचार, दबाव और पुलिस व्यवस्था: जब सवाल उठाना ही जोखिम बन जाए

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

भ्रष्टाचार, दबाव और पुलिस व्यवस्था: जब सवाल उठाना ही जोखिम बन जाए

ईमानदार अफसरों के बावजूद भरोसे के संकट में सिस्टम

लखनऊ । प्रदेश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस व्यवस्था को लेकर आम नागरिकों के बीच भरोसा लगातार कमजोर होता दिखाई दे रहा है। इसकी प्रमुख वजह वे घटनाएं हैं, जो समय-समय पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और दबाव की राजनीति से जुड़ी होकर सामने आती रहती हैं। एंटी करप्शन एजेंसियों द्वारा रिश्वत लेते पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की गिरफ्तारी की खबरें सार्वजनिक होती रही हैं, जिससे यह धारणा गहराती जा रही है कि समस्या केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवस्था से जुड़ी हुई है।

हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि यह स्पष्ट किया जाए कि पुलिस विभाग में आज भी बड़ी संख्या में ईमानदार, कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी व कर्मचारी मौजूद हैं, जो सीमित संसाधनों, राजनीतिक दबाव और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद निष्पक्षता से अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर देती हैं और उसी का खामियाजा ईमानदार अफसरों को भी भुगतना पड़ता है।

पैसे से मिलने वाली पोस्टिंग और बिगड़ती पुलिसिंग

सार्वजनिक विमर्श में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि जब ट्रांसफर और पोस्टिंग जैसी संवेदनशील प्रशासनिक प्रक्रियाएं कथित तौर पर पैसों और सिफारिशों से जुड़ जाती हैं, तो निष्पक्ष और प्रभावी पुलिसिंग की अपेक्षा कमजोर हो जाती है। जहां योग्यता और अनुभव के बजाय लेन-देन को प्राथमिकता मिलने की धारणा बनती है, वहां सेवा की भावना पीछे छूट जाती है और प्राथमिकता निवेश की भरपाई बन जाती है। इसका सीधा असर आम आदमी को मिलने वाले न्याय पर पड़ता है।

भ्रष्टाचार की जड़ें और सत्ता-सिस्टम का दबाव

अक्सर यह सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार की शुरुआत कहां से होती है। जनमानस में यह धारणा तेजी से प्रबल हो रही है कि भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी जड़ें ऊपर तक फैली होती हैं। जब सत्ता और सिस्टम से दबाव बनता है, तो उसका असर ज़मीनी स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों तक पहुंचता है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही धीरे-धीरे कमजोर होती चली जाती है।

गरीब के लिए प्रक्रिया, प्रभावशाली के लिए सुविधा

आज की सबसे पीड़ादायक सच्चाई यह मानी जा रही है कि जिनके पास पैसा, पहुंच और प्रभाव है, वे सिस्टम को अपेक्षाकृत आसानी से अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं, जबकि गरीब, कमजोर और बिना सिफारिश वाला व्यक्ति न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होता है। यह धारणा आम होती जा रही है कि बिना पैसे या ‘एप्रोच’ के न तो शिकायत को गंभीरता से सुना जाता है और न ही त्वरित कार्रवाई होती है।

आवाज दबाने का आरोप और पुलिस की भूमिका पर सवाल

हाल के वर्षों में एक और गंभीर और संवेदनशील प्रवृत्ति पर चर्चा तेज हुई है। आम धारणा बनती जा रही है कि सत्ताधारी वर्ग के खिलाफ आवाज उठाने वालों को चुप कराने के लिए पुलिस और प्रशासनिक तंत्र का सहारा लिया जाता है। कई मामलों में आरोप लगते रहे हैं कि विरोध करने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं या फिर प्रभावशाली लोगों द्वारा अपने समर्थकों से प्रार्थना पत्र दिलवाकर मामले दर्ज करवा दिए जाते हैं।

भले ही हर मामला कागजी तौर पर नियमों के तहत दर्ज दिखाया जाता हो, लेकिन जब ऐसी कार्रवाइयां सवाल उठाने के तुरंत बाद होती हैं, तो यह संदेश जाता है कि विरोध और असहमति की एक कीमत तय है। यही भावना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे अधिक चिंताजनक मानी जाती है।

चालान, नोटिस और मुकदमे: दबाव का नया तरीका?

हाल के दिनों में चालान, नोटिस और विभिन्न प्रकार की कानूनी कार्रवाइयों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि कई बार इन प्रक्रियाओं का इस्तेमाल केवल कानून पालन के लिए नहीं, बल्कि दबाव बनाने के लिए किया जाता है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि सिस्टम सवाल करने वालों के प्रति अधिक सख्त और प्रभावशाली लोगों के प्रति अपेक्षाकृत नरम है।

विपक्ष की चुप्पी और लोकतांत्रिक संतुलन पर असर

इस पूरे घटनाक्रम में विपक्ष या विरोधी स्वरों की चुप्पी भी एक बड़ा सवाल बनकर उभरती है। सत्ताधारी तंत्र के कथित गलत कार्यों पर खुलकर बोलने से परहेज किया जाता है। कई लोग मानते हैं कि मुकदमों और कार्रवाई के डर से राजनीतिक और सामाजिक विरोध कमजोर होता जा रहा है। इससे लोकतंत्र का संतुलन प्रभावित होता है, क्योंकि सत्ता पर निगरानी और सवाल उठाना लोकतंत्र का मूल तत्व है।

डर का माहौल और आम आदमी की खामोशी

जब आम नागरिक यह महसूस करने लगे कि शिकायत करना, सवाल पूछना या आवाज उठाना खुद एक जोखिम बन सकता है, तो वह चुप रहना ही बेहतर समझता है। यही खामोशी धीरे-धीरे असंतोष में बदलती है। कानून का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि भरोसा देना होता है, और जब भरोसा टूटता है, तो व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ने लगती है।

समाधान की दिशा में जरूरी कदम

इस गंभीर और संवेदनशील स्थिति से निपटने के लिए केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस सुधार आवश्यक हैं—

ट्रांसफर और पोस्टिंग में पूर्ण पारदर्शिता

भ्रष्टाचार पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई

ईमानदार पुलिसकर्मियों को संस्थागत संरक्षण

झूठे और दबाव आधारित मामलों की निष्पक्ष जांच

आम नागरिक की शिकायतों की निर्भीक सुनवाई

सत्ता, राजनीति और पुलिस के बीच स्पष्ट सीमाएं

निष्कर्ष

पुलिस व्यवस्था लोकतंत्र की रीढ़ है। यदि इसी व्यवस्था से जनता का भरोसा डगमगाने लगे और सवाल उठाना ही जोखिम बन जाए, तो उसका असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और शासन प्रणाली पर पड़ता है। आवश्यक है कि ईमानदार अफसरों का मनोबल बढ़े, भ्रष्ट और दबाव में काम करने वाले तत्वों पर बिना भेदभाव कार्रवाई हो और असहमति को अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाए। तभी आम आदमी को यह भरोसा लौटेगा कि कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है।

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