रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़
तफ्तीश नहीं, सौदेबाज़ी चल रही है: जांच की आड़ में डगमगाता न्याय
नाम–धाराओं का खेल, पुलिस जांच पर उठते सवाल; एंटी करप्शन की कार्रवाई से सामने आती सच्चाई
लखनऊ । प्रदेश में कानून का सबसे अहम और संवेदनशील चरण—जांच—आज सबसे अधिक भरोसे की परीक्षा से गुजर रहा है। तफ्तीश, जिसका उद्देश्य सच्चाई तक पहुंचना है, कई मामलों में प्रक्रिया तक सिमटती दिख रही है। हालात यह हैं कि थानों से लेकर जांच अधिकारियों के स्तर तक नाम जोड़ने–घटाने और धाराओं में बदलाव को लेकर आमजन के मन में लगातार प्रश्न उठ रहे हैं।
हर प्रार्थना पत्र एक ही जवाब—पहले जांच
आज किसी भी थाने में जब पीड़ित मुकदमा दर्ज कराने पहुंचता है, तो उसे प्रायः यही कहा जाता है—“पहले जांच होगी, उसके बाद कार्रवाई।” यह प्रक्रिया कानून सम्मत है, लेकिन जनता की चिंता यह है कि जब यही जांच निष्पक्ष न हो, तो आगे की पूरी कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। लोगों का मानना है कि जांच की आड़ में ही निर्णय प्रभावित होने की गुंजाइश सबसे अधिक रहती है।
जांच अधिकारी के हाथ में अधिकार, भरोसे की बड़ी जिम्मेदारी
प्राथमिकी दर्ज होते ही मामला जांच अधिकारी को सौंप दिया जाता है। कानून उन्हें साक्ष्यों के आधार पर नाम जोड़ने–घटाने और धाराओं में आवश्यक संशोधन का अधिकार देता है। यह अधिकार न्याय को सही दिशा देने के लिए है, लेकिन जब इसके उपयोग को लेकर संदेह पैदा होता है, तो पूरी जांच प्रक्रिया कठघरे में खड़ी हो जाती है।
जांच में ही संदेह, तो न्याय अधूरा
आमजन का कहना है कि यदि जांच ईमानदारी और पारदर्शिता से हो जाए, तो अधिकांश मामलों में पीड़ित को न्याय मिल सकता है। लेकिन जब जांच के शुरुआती चरण में ही निर्णयों को लेकर संदेह पैदा हो जाए, तो अदालत तक पहुंचने से पहले ही न्याय कमजोर पड़ जाता है।
प्रदेश में ताज़ा एंटी करप्शन कार्रवाई—पुलिस से जुड़े मामले
बीते कुछ समय में प्रदेश के अलग-अलग जिलों में एंटी करप्शन इकाई द्वारा की गई कार्रवाइयों में कई पुलिस अधिकारी रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए। इन मामलों में मुकदमे से नाम हटाने, दोबारा नाम जोड़ने, कार्रवाई में राहत देने या धाराएं घटाने-बढ़ाने जैसे आरोप सामने आए।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि निगरानी तंत्र सक्रिय है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया है कि जांच प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
एंटीकरप्शन की कार्रवाई—सुधार का संकेत
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी कार्रवाइयाँ केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने का अवसर भी हैं। इनसे यह संदेश जाता है कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि जनता का भरोसा कायम रहे।
जांच पर टिका है जनविश्वास
आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जांच प्रक्रिया से आम नागरिक का विश्वास कमजोर न पड़े। पुलिस व्यवस्था की साख केवल कार्रवाई से नहीं, बल्कि निष्पक्ष तफ्तीश से बनती है। जब जांच पर भरोसा बना रहता है, तभी कानून व्यवस्था के प्रति सम्मान भी बना रहता है।
तफ्तीश की विश्वसनीयता ही कानून की असली पहचान
किसी भी राज्य में कानून की ताकत उसके दंड में नहीं, उसकी जांच में छिपी होती है। यदि तफ्तीश निष्पक्ष है, तो न्याय स्वाभाविक रूप से मजबूत होता है। लेकिन यदि जांच प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, तो इसका असर केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहता—पूरा तंत्र प्रभावित होता है।
एंटी करप्शन की हालिया कार्रवाइयाँ यह बताती हैं कि निगरानी व्यवस्था सक्रिय है, लेकिन साथ ही यह भी दर्शाती हैं कि सुधार की जरूरत अभी बाकी है। जांच अधिकारियों को मिले अधिकार न्याय के लिए हैं, इसलिए इन अधिकारों के साथ जवाबदेही और पारदर्शिता का संतुलन अनिवार्य है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि निष्पक्ष तफ्तीश ईमानदार पुलिसकर्मियों की ढाल होती है। जब जांच पर भरोसा रहता है, तो वर्दी का सम्मान स्वतः बढ़ता है और पुलिस-जनता के बीच विश्वास मजबूत होता है।
अंततः निष्कर्ष स्पष्ट है—
पुलिस की सबसे बड़ी शक्ति उसकी तफ्तीश है।
तफ्तीश मजबूत होगी, तो न्याय मजबूत होगा।
और न्याय मजबूत होगा, तो कानून पर विश्वास कायम रहेगा।
