ट्रॉनिका सिटी में उद्योगों का ज़हर, प्रशासन मौन रंगाई, जींस, धुलाई व प्रदूषणकारी इकाइयों का रसायन युक्त पानी बेहिचक बहाया जा रहा, शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

ट्रॉनिका सिटी में उद्योगों का ज़हर, प्रशासन मौन

रंगाई, जींस, धुलाई व प्रदूषणकारी इकाइयों का रसायन युक्त पानी बेहिचक बहाया जा रहा, शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं

लोनी । ट्रॉनिका सिटी औद्योगिक क्षेत्र में रंगाई, जींस धुलाई एवं अन्य जल-प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रतिदिन रसायन युक्त जहरीला पानी खुलेआम बहाया जा रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि लगातार शिकायतों के बावजूद प्रशासन पूरी तरह मौन साधे हुए है। यह स्थिति अब केवल पर्यावरण प्रदूषण तक सीमित न रहकर गंभीर जन-स्वास्थ्य संकट में तब्दील हो चुकी है।

स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्र से प्रतिदिन लगभग 16 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) प्रदूषित पानी निकल रहा है, जबकि ट्रॉनिका सिटी में स्थापित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता पहले से ही बेहद कम है। हालात और भी चिंताजनक इसलिए हैं क्योंकि यह एसटीपी प्लांट अधिकतर समय बंद ही रहता है, जिससे अधिकांश दूषित जल बिना किसी शोधन के नालियों, सड़कों और खुले भूभागों में बहा दिया जाता है।

16 एमएलडी गंदा पानी, बंद पड़ा एसटीपी बना संकट की जड़

जानकारी के अनुसार, जिस एसटीपी के माध्यम से औद्योगिक अपशिष्ट जल का उपचार होना चाहिए, वह अधिकांश समय या तो बंद रहता है या नाममात्र के लिए संचालित किया जाता है। परिणामस्वरूप, 16 एमएलडी प्रदूषित पानी का बड़ा हिस्सा सीधे पर्यावरण में छोड़ा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एसटीपी का बंद रहना और उसकी अपर्याप्त क्षमता, दोनों ही एनजीटी और पर्यावरण कानूनों का गंभीर उल्लंघन हैं।

जहरीला पानी जमीन में उतारने का आरोप, भूजल प्रदूषित

ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ फैक्ट्री संचालक इस रसायन युक्त पानी को रिपोर्ट कर जमीन में उतार देते हैं, जिससे आसपास के गांवों का भूजल जहरीला हो चुका है। कई गांवों में हैंडपंप और बोरिंग का पानी बदबूदार, रंगीन और पीने योग्य नहीं रह गया है।

भूजल प्रदूषण से बीमारियों का बढ़ता ग्राफ

पिछले एक दशक में क्षेत्र में चर्म रोग, पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियां, सांस संबंधी रोग और कैंसर जैसे घातक रोगों के मामलों में तेज़ वृद्धि दर्ज की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि लगभग हर गांव में गंभीर बीमारी से पीड़ित परिवार मिल जाएंगे, जिससे क्षेत्र में भय और आक्रोश का माहौल व्याप्त है।

नियम-कानून कागज़ों में, ज़मीन पर ज़हर

आरोप है कि अधिकांश रंगाई और जींस धुलाई फैक्ट्रियों में अनिवार्य मिनी ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) या तो लगे ही नहीं हैं या केवल कागज़ों में दर्शाए गए हैं। केमिकल युक्त पानी खुलेआम नालियों और सड़कों पर बह रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण बल्कि आम लोगों की दैनिक ज़िंदगी भी प्रभावित हो रही है।

जमीन अधिग्रहण के वक्त किया गया करार टूटा

ग्रामीणों ने बताया कि औद्योगिक विकास निगम ने जमीन लेते समय उनसे यह स्पष्ट वादा किया था कि इस औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण फैलाने वाली कोई भी इकाई संचालित नहीं की जाएगी। लेकिन आज वही क्षेत्र प्रदूषणकारी उद्योगों का गढ़ बन चुका है। ग्रामीणों का आरोप है कि औद्योगिक विकास निगम अपने वायदे से मुकर गया है और उद्योगों के नाम पर ग्रामीणों को बीमारियां और मौत बांटी जा रही हैं।

शिकायतें अनेकों, कार्रवाई शून्य

क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण विभाग, प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से कई बार शिकायत की, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं और उद्योगों के लिए नहीं?

जनाक्रोश उफान पर, आंदोलन की चेतावनी

लगातार अनदेखी के चलते क्षेत्र में जनाक्रोश उफान पर है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध डिस्चार्ज तत्काल बंद नहीं कराया गया, एसटीपी को नियमित रूप से चालू नहीं किया गया और प्रदूषणकारी इकाइयों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो वे सड़क पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

मानव जीवन के लिए खतरा 

ट्रॉनिका सिटी में प्रतिदिन निकल रहा 16 एमएलडी जहरीला औद्योगिक जल, बंद पड़ा एसटीपी और प्रशासन की चुप्पी—ये तीनों मिलकर क्षेत्र को स्वास्थ्य आपदा की ओर धकेल रहे हैं। यदि अब भी निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो यह औद्योगिक क्षेत्र विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए स्थायी खतरा बन जाएगा।

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