बांग्लादेश में हिंदुओं का खून, दुनिया की खामोशी पर उठते सवाल

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रविन्द्र बंसल प्रधान संपादक / जन वाणी न्यूज़

बांग्लादेश में हिंदुओं का खून, दुनिया की खामोशी पर उठते सवाल

शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अल्पसंख्यकों पर बढ़े हमले, दर्जनों मौतें, सैकड़ों घटनाएं

नई दिल्ली । बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा अब अलग–थलग घटनाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक लगातार फैलते मानवीय संकट का रूप ले चुकी है। बीते डेढ़ वर्ष में हत्याएं, मंदिरों पर हमले, घरों और दुकानों की तोड़फोड़, महिलाओं के साथ अत्याचार तथा जबरन पलायन की घटनाओं ने वहां के सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह झकझोर दिया है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब एक समुदाय को खुलेआम निशाना बनाया जा रहा है, तब वैश्विक मानवाधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय मंच लगभग मौन क्यों हैं?

सत्ता परिवर्तन के बाद बिगड़े हालात

राजनीतिक अस्थिरता की आड़ में अल्पसंख्यकों पर हमला

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के गिरने के बाद बांग्लादेश में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का सबसे गहरा असर हिंदू समुदाय पर पड़ा। सत्ता परिवर्तन के बाद कई इलाकों में कानून व्यवस्था कमजोर पड़ी, जिसका फायदा उठाकर उग्र और कट्टरपंथी तत्वों ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।

गांवों से लेकर शहरों तक हिंदुओं के घरों में आगजनी, पूजा स्थलों को अपवित्र करने, मूर्तियों को तोड़ने, दुकानों को लूटने और निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या की घटनाएं सामने आईं। अनेक मामलों में पीड़ितों का आरोप है कि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, जिससे हिंसा और फैलती चली गई।

आंकड़ों में भयावह तस्वीर

हिंसा के मामले हजारों में, मौतें दर्जनों में

उपलब्ध सामाजिक और मानवाधिकार आकलनों के अनुसार—

वर्ष 2024 के मध्य से अब तक दो हजार से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं

इस अवधि में बीस से अधिक हिंदुओं की हत्या की पुष्टि हुई

सौ से अधिक मंदिरों पर हमले या तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं

सैकड़ों हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा

वर्ष 2026 की शुरुआत में ही कुछ ही दिनों के भीतर कई हिंदुओं की हत्या की खबरों ने पूरे देश में दहशत का माहौल और गहरा कर दिया।

क्यों निशाने पर हिंदू समुदाय

धर्म, राजनीति और भीड़तंत्र का घातक मेल

विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदू समुदाय को एक राजनीतिक वर्ग से जोड़कर देखना, उन्हें सत्ता समर्थक ठहराना और धार्मिक उन्माद फैलाना हिंसा का मुख्य कारण बन रहा है। कई मामलों में ईशनिंदा के झूठे आरोप, अफवाहें और भीड़ को भड़काने वाले संदेश हिंसा की चिंगारी बने।

भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेकर हत्या करना और उसके बाद दोषियों का बच निकलना, राज्य की विफलता की तस्वीर पेश करता है।

 

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की चुप्पी

चयनात्मक संवेदना पर गंभीर सवाल

दुनिया भर में मानवाधिकार की दुहाई देने वाले संगठन जब अन्य देशों की घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, तब बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा पर उनकी खामोशी सवालों के घेरे में है।

विश्लेषकों का कहना है कि इसके पीछे कूटनीतिक हित, राजनीतिक समीकरण और अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं का बदलना जैसे कारण जिम्मेदार हैं। नतीजतन, पीड़ितों की आवाज सीमाओं के बाहर दब जाती है और हमलावरों का मनोबल बढ़ता जाता है।

डर, पलायन और टूटा भरोसा

असुरक्षा के साये में जीता हिंदू समाज

लगातार हो रही हिंसा के कारण बांग्लादेश का हिंदू समाज आज भय और अनिश्चित भविष्य के साये में जी रहा है। कई परिवारों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया, व्यापार समेट लिया और पीढ़ियों से बसे इलाकों को छोड़ने पर मजबूर हो गए।

लोगों का कहना है कि न्याय की उम्मीद भी कमजोर पड़ती जा रही है, क्योंकि शिकायत करने पर उलटे प्रताड़ना का खतरा बना रहता है।

चुप्पी टूटी तो बचेगा मानवाधिकार

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा केवल एक देश की आंतरिक समस्या नहीं, बल्कि मानवता और अंतरात्मा की वैश्विक परीक्षा है। यदि समय रहते अंतरराष्ट्रीय दबाव, निष्पक्ष निगरानी और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।

अब आवश्यकता है कि चुप्पी तोड़ी जाए, पीड़ितों की आवाज सुनी जाए और यह स्पष्ट संदेश दिया जाए कि धर्म के आधार पर किसी भी समुदाय पर अत्याचार स्वीकार्य नहीं है।

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