जन वाणी न्यूज़
गाजियाबाद
13 वर्षों की पीड़ा, इच्छामृत्यु की गुहार और फिर सरकार का सहारा
हरीश राणा के घर पहुंचे जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री के निर्देश पर आर्थिक सहायता व आजीविका का आश्वासन
रविन्द्र बंसल वरिष्ठ संवाददाता जन वाणी
गाजियाबाद। लंबे समय से असाध्य बीमारी और आर्थिक तंगी की मार झेल रहे हरीश राणा के परिवार की पीड़ा उस समय पूरे देश के सामने आई जब परिवार ने विवश होकर भारत का सर्वोच्च न्यायालय में इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। वर्षों से चल रही इस मानवीय त्रासदी ने न केवल न्याय व्यवस्था बल्कि शासन-प्रशासन का भी ध्यान अपनी ओर खींचा। इसी क्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गाजियाबाद के जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार मांडड़ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ हरीश राणा के घर पहुंचे और परिवार से मिलकर उनकी पीड़ा को करीब से सुना।
बताया जाता है कि करीब तेरह वर्ष पहले एक दुर्घटना के बाद हरीश राणा गंभीर मस्तिष्क चोट के कारण लगभग अचेत अवस्था में चले गए थे। लंबे समय तक उपचार, दवाइयों और देखभाल के बावजूद उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। लगातार बढ़ते चिकित्सा खर्च और आय के स्थायी साधन के अभाव ने परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। अंततः इसी निराशा में परिवार को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा और इच्छामृत्यु की अनुमति की गुहार लगानी पड़ी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चिकित्सकीय रिपोर्टों और परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित प्रक्रिया को अनुमति देने का आदेश दिया। यह निर्णय मानवीय गरिमा और असाध्य पीड़ा से जूझ रहे रोगियों के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।
इधर मामला सामने आने के बाद प्रदेश सरकार ने भी संवेदनशीलता दिखाते हुए परिवार की मदद के लिए कदम उठाए। मुख्यमंत्री के निर्देश पर जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार मांडड़ स्वयं हरीश राणा के घर पहुंचे और परिजनों से विस्तार से बातचीत की। जिलाधिकारी ने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देशों के क्रम में परिवार से मुलाकात कर उनकी परिस्थितियों को समझा गया है और दुख की इस घड़ी में शासन परिवार के साथ खड़ा है।
प्रशासन की ओर से तत्काल राहत देते हुए दस लाख रुपये की आर्थिक सहायता स्वीकृत की गई है। साथ ही परिवार की आजीविका को स्थिर करने के उद्देश्य से गाजियाबाद विकास प्राधिकरण अथवा नगर निगम के माध्यम से स्थायी दुकान आवंटित करने की व्यवस्था की जाएगी, जिससे परिवार को नियमित आय का साधन मिल सके।
जिलाधिकारी ने यह भी बताया कि हरीश राणा के उपचार में अब तक हुए दवाइयों और चिकित्सा से जुड़े खर्च का वहन चिकित्सा विभाग द्वारा किया जाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में भी यदि परिवार को किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होगी तो शासन और जिला प्रशासन हर संभव सहयोग प्रदान करेगा।
हरीश राणा का यह मामला केवल एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा की झलक भी है जो गंभीर बीमारी, आर्थिक अभाव और उपचार की सीमाओं के बीच संघर्ष कर रहे हैं। वर्षों की असहनीय पीड़ा के बाद न्यायालय का निर्णय और शासन की पहल, दोनों ने इस परिवार के जीवन में एक साथ संवेदना और सहारे का संदेश दिया है।
दुख, विवशता और उम्मीद के बीच खड़ी इस कहानी ने समाज को भी यह सोचने पर मजबूर किया है कि गंभीर बीमारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों के लिए संवेदनशील व्यवस्था और सामाजिक सहारा कितना आवश्यक है।
